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बिहार की लोक संस्कृति से भी समृद्ध हुई भारतीय कला

वरीय संवाददाता पटना। बिहार की लोकसंस्कृति से भी भारतीय कला समृद्ध हुई है। यहां की लोककला, लोकसंगीत प्राचीन काल में तो उच्चकोटि की थी ही आधुनिक काल में भी इसका जोर नहीं है। हर महत्वपूर्ण अवसरों के गीत हैं। पर्व-त्योहार हो या शादी-ब्याह, मुंडन, उपनयन के संस्कार तक के पारंपिरक गीत हैं। साधनविहीन होते हुए भी लोग अपनी कला व संस्कृति से अटूट रिश्ता बनाए हुए हैं।

भारतीय कला के निर्माण में बिहार के योगदान विषय पर पटना म्युजियम में आयोजित तीन दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार के दूसरे दिन शिनवार को वक्ताओं ने अपने-अपने शोधपत्रों के जिरए इन बिन्दुओं पर रोशनी डाली। शिनवार को कला निर्माण में बिहार के योगदान पर कुल 15 विशेषज्ञों ने शोधपत्र पढ़े।

पहले सत्र में बीएचयू के कला, इतिहास व पर्यटन प्रबंध विभाग के अध्यक्ष प्रो. मारुति नंदन तिवारी की अध्यक्षता में 8 विशेषज्ञों ने और दूसरे सत्र में डॉ. सीपी सिन्हा की अध्यक्षता में 7 विद्वानों ने भारतीय कला के निर्माण में बिहार की कलाओं के योगदान पर अपनी बातों को रखा।

बीएचयू के प्रो. एसएस सिन्हा ने अपने शोध पत्र में जैन मूर्तियों और तीर्थाकरों के देन पर फोकस किया। संजीव सिन्हा ने बिहार की समृद्ध लोकसंस्कृति पर विस्तार से बातों को रखा।

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