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गोमती है यह,डम्पिंग ग्राउण्ड नहीं

नगर निगम के लिए नियमों के मायने बदल गए। रोाना सैकड़ों टन घरेलू कूड़े से नदी पाटीोा रही है। अपशिष्ट से रिसने वाला हÊाारों लीटर लिचेड (रासायनिक पदार्थ) नदी में धीर-धीर Êाहर घोल रहा है। बारिश में तो लिचेड की मात्रा बढ़ोाती है क्योंकि कूड़ा सड़ने की प्रक्रिया बरसात में ही पूरी होती है। लगभग 15 किलोमीटर डाउन स्ट्रीम तक नदी क्षेत्र में इसका व्यापक असर पड़ेगा। विशेषज्ञों के मुताबिक नदी का पारिस्थितिकीय संतुलन अभी और बिगड़ेगा। क्योंकि लिचेड को नदी में पहुँचने से नहीं रोकाोा सका है। उससे रिसने वाले रासायनिक पदार्थो में नाइट्रेट व सल्फेट के अलावा घातक कार्बनिक तत्व शामिल हैं। हाल ही नदी में नाइट्रेट मिलने की भी पुष्टि हुई है। इसे देखते हुए राष्ट्रीय पर्यावरण रिसर्च इंस्टीटय़ूट (नेरी) के वैज्ञानिक नदी में लिचेड का अध्ययन करने लखनऊ आ रहे हैं।ड्ढr कचरा निस्तारण के लिए नगर निगम के पास अभी कोई योना नहीं है। घरलू कूड़ा खुले मैदान में या नदी तट पर फेंकाोा रहा है। इस कचर में अस्पतालों से निकलने वाली पट्टी, सिरिां व प्लॉस्टिक बैग भी शामिल है। नियमों के मुताबिक किसी भी ‘वाटर बाड़ीÊा’ यानी नदी, तालाब व पोखर के तटीय क्षेत्र से एक किलोमीटर दूर कचरे का निस्तारण होना चाहिए लेकिन नदी का समूचा डाउन स्ट्रीम नगर निगम का डम्पिंग ग्रांउड है। इस समस्या से परशान उत्तर प्रदेश प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने कचरा निस्तारण, निाी क्षेत्रों के हवाले करने की सिफारिश की है।ड्ढr प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुख्य पर्यावरण अभियंता सुनील कुमार सिंह का कहना है कि म्यूनिसिपल सालिड वेस्ट (एमएसडब्लू) में 25 प्रतिशत अपशिष्ट का इस्तेमाल खाद, गैस व बिाली बनाने मेंकियाोा सकता है। 25 प्रतिशत को सुरक्षित तरीके से दफन कियाोाना चाहिए। इसके लिए टैंक की विशेष तरह से डिााइनिंग होोिससे लिचेडोमीन के नीचे नोा सके। उनके मुताबिक बायोमेडिकल वेस्ट यानी अस्पताली कचर पर काफी हद तक काबू पायाोा चुका है। मुख्य पर्यावरण अभियंता स्वामीनाथ राम का कहना है कि कचरा निस्तारण के लिए ऐसीोगह होनी चाहिएोहाँ पशु-पक्षी तक नोा सकें। निस्तारण भी सुरक्षित टैंक में हो। उनका कहना है कि नगर निगम का कचरा गोमती के क्षेत्र में है। लाखों टन कचर से नदी को पाटा गया है। बरसात में उससे रिसकर लिचेडोाने की पूरी संभावना है। उनका कहना है कि नेरी इस सम्बंध मेंोाँच करगी।ं

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