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दो टूक

किस्मत ने गुरबत दी। ऊपर से सरकारीतंत्र की यह बेरुखी! कहने को तो झारखंड के सरकारी दस्तावेजों में गरीबी रखा से नीचे ऐसे 2लाख परिवारों के लिए सस्ते राशन की व्यवस्था है। इसी के नाम पर खजाने से करोड़ो निकाले जाते हैं। हाारों को रोगार दे रहा पूरा महकमा चलता है। अफसरानों की एसी गाड़ियां फर्राटे भरती हैं। हवाई टिकटों का जुगाड़ हो रहा है। फिर, वह अभागे ही क्यों मोहताज हैं, महीनों से दाने-दाने को! .झार-खंड है। मौसम रहते जंगली फल-पत्तियों से पेट की आग बुझा ही लेंगे!?. क्या यही सोचते हैं ये हुक्मरान। नहीं..? तो किसके भरोसे तज दिया है इन अभागों को। ऊपरवाले को न सही, प्रकृति के नियमों को तो याद कीािए। फल-फूल-पत्तियां शेष हो जायें तो ठूंठ बड़े डरावने होते हैं!ड्ढr

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