DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

आप हमेशा याद रहेंगे विजय बोस

विजय बोस ने जब चिरनिद्रा धारण की, तब तक उन्हें आकाशवाणी छोड़े दशकों बीत चुके थे। जिस देश में आधी से ज्यादा आबादी 35 बरस से कम की हो, उसके लिए ये बड़ी अवधि है, पर विजय दा जैसे लोग अपने छोटे दायरों में ही इतने बड़े काम करते रहे हैं कि उनके लिए समय के बंधन ढीले पड़ जाते हैं।

मेरी यादों में आज भी वे लम्हे किसी सुनहरी इबारत की तरह दर्ज हैं, जब हम आकाशवाणी इलाहाबाद के ‘बालसंघ’ कार्यक्रम में जाया करते थे। उन दिनों विजय बोस और दुर्गा मेहरोत्रा इसे पेश करते थे। इलाहाबाद और आसपास के बच्चे जिन वजहों से इतवार का इंतजार बेसब्री से करते थे, उनमें से एक यह कार्यक्रम भी था। मैं ईमानदारी से कहता हूं कि ‘बालसंघ’ में अगर शिरकत करने का मौका न मिलता, तो शायद मैं कभी पत्रकारिता में इतना सफल नहीं हुआ होता। मेरे बालमन पर विजय बोस की गहरी छाप पड़ी थी। वह जिस तरह बच्चों को अच्छी सामग्री चुनने के लिए प्रेरित करते, उन्हें बोलने की कला सिखाते और अगली बार कुछ बेहतर करने की प्रेरणा देते, वह बेमिसाल था।

यह 1967 का वाकया होगा। मैं कक्षा तीन में पढ़ता था। पिता आकाशवाणी में ही थे। इसलिए वहां अक्सर जाने का मौका मिलता। उन्हीं दिनों मैंने किसी सस्ती पत्रिका में राम, रावण और सीता के बारे में भौंडा-सा चुटकुला पढ़ा। बालसंघ रिकॉर्ड करने से पहले बड़े भैया (बालसंघ कार्यक्रम में विजय बोस का यही नाम होता था) बच्चों से रिहर्सल कराते। रिहर्सल के दौरान मैंने वह चुटकुला पढ़ा। ‘बड़े भैया’ ने कहा कि इसे दोबारा किसी को मत सुनाना। हमारे पुराणों में जिन चरित्रों का वर्णन किया गया है, वे मजाक नहीं, बल्कि श्रद्धा की विषय-वस्तु हैं। मैंने हामी भर दी। थोड़ी देर बाद रिकॉर्डिग शुरू हुई। मेरा नंबर आते-आते बालमन उनकी नसीहत भूल चुका था। मैंने वही चुटकुला रिकॉर्ड करा दिया। ‘बड़े भैया’ और दुर्गा जी चुपचाप सुनते रहे। रिकॉर्डिग खत्म होने के बाद उन्होंने बड़ी शाइस्तगी से कहा कि तुम्हें ऐसा नहीं करना चाहिए था। नसीहतें भूलने के लिए नहीं, बल्कि अमल में लाने के लिए होती हैं।

रविवार को जब कार्यक्रम सुना, तो मैं सिरे से नदारद था। अब आप ही बताइए, संपादन भला और क्या होता है? यही न कि किसी को चोट पहुंचाने वाली, इतिहास को तोड़ने-मरोड़ने वाली अथवा समाज पर बुरा प्रभाव डालने वाली सामग्री से बचाव। जाने-अनजाने सात साल के उस बच्चे को जो सीख मिली थी, बरसों बीतने के बावजूद, आज तक कायम है।
बाद में रामगोपाल सिंह चौहान के सान्निध्य में आगरा में जब रंगकर्म की दीक्षा लेनी शुरू की, तो आवाज के उतार-चढ़ाव, भावनाओं को शब्दों के जरिये बयान करने की कला और आवाज से ही सब कुछ दर्शकों तक पहुंचा देने की बारीकियों को समझने में देर नहीं लगी। उन दिनों रह-रहकर ‘बड़े भैया’ याद आते। इसमें कोई दो राय नहीं कि ‘बड़े भैया’ मेरे जैसे सैकड़ों लोगों के लिए नींव के उस पत्थर की मानिंद हैं, जिस पर इमारत तो टिकी होती है, पर लोग उसे देख नहीं पाते।

उनकी शख्सियत के दूसरे पहलू भी थे। नौटंकी की दुनिया में विनोद रस्तोगी के साथ उन्होंने आकाशवाणी में तमाम प्रयोग किए। वह आकाशवाणी का स्वर्णकाल था। उन दिनों इलाहाबाद केंद्र में तमाम अजीम शख्सियतें योगदान करती थीं। इलाचंद्र जोशी, केशवचंद्र वर्मा, नरेश मेहता, कैलाश गौतम, शांति मेहरोत्रा, राजा जुत्शी आदि ऐसे लोग थे, जिन्हें अपनी विधा का चलता-फिरता विद्यालय कहा जा सकता है। 1970 के दशक तक आकाशवाणी सिर्फ सरकारी ब्रॉडकास्टर नहीं, बल्कि संस्कृति का पोषक हुआ करता था। आजादी से पहले कला पोषण का जो काम राजाओं और नवाबों ने किया, वही स्वतंत्रता प्राप्ति के ढाई दशक बाद तक आकाशवाणी ने किया। आप आज जिस आकाशवाणी को देख-सुन रहे हैं, उसकी नींव आपातकाल में पड़ी। उन दिनों कड़ी सेंसरशिप और सरकारी गुणगान के सतत दबाव ने कला-संस्कृति की इस धारा को छिन्न-भिन्न कर दिया। इतिहास इस कटु सत्य को हमेशा एक आह के साथ याद करेगा।
विजय दा पर लौटते हैं। ‘बालसंघ’ के अलावा ‘मुंशी इतवारी लाल’ में फिदा हुसैन का नाम आते ही लोगों के कान खड़े हो जाते। विजय बोस की आवाज ने उस अनदेखे चेहरे को छवि दे दी थी। बांग्लाभाषी होने के बावजूद उनका उच्चारण इतना साफ था कि लगता, गंगा-यमुना का दोआब जीवंत हो उठा है। उनकी आवाज ही उनकी पहचान थी। उस समय चलते-फिरते लोग भी ‘मुंशी इतवारी लाल’ सुनने के लिए ठिठककर रुक जाया करते थे। हिन्दुस्तान की शहरी सभ्यता की विकास गाथा के उस दौर में इलाहाबाद, वाराणसी, लखनऊ, पटना या रांची जसे शहर अपनी जीवंतता के लिए जाने जाते थे। इसीलिए प्रतिभा संपन्न लोगों को वहां से पलायन के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता था। जरा सोचिए, एक ही शहर में निराला, महादेवी, पंत, इलाचंद्र जोशी, रामकुमार वर्मा, ‘अश्क’, अमरकांत जैसे तमाम गुणी एक साथ रहते हों, तो नई पीढ़ी के लिए सीखने को कितना कुछ रहा होगा? संगम नगरी में संस्कृति की सर्वोच्चता का यह आलम था कि जज, वकील और मुवक्किल आकाशवाणी में एक ही पांत में बैठते थे।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय के एक अवकाश प्राप्त जज ने पिछले दिनों मजेदार किस्सा सुनाया। वह जब वकील थे, तब आकाशवाणी के प्रहसनों में विजय बोस के साथ हिस्सेदार होते थे। आगे चलकर उन्हें न्यायाधीश बना दिया गया। कार्यभार सम्हालने में अभी एकाध हफ्ता ही शेष था कि आकाशवाणी के एक नाटक में किरदार निभाने का न्यौता मिला। उन्होंने शर्त रखी कि नाटक के दौरान उनकी नियुक्ति का जिक्र नहीं होगा। पर यह क्या? रिकॉर्डिग के दौरान विजय बोस ने डायलॉग जड़ दिया कि अमुक कुछ दिन बाद हाईकोर्ट में फैसले करते मिलेंगे। होने वाले जज साहब सन्न! पर कोई बात नहीं। रिकॉर्डिग हो चुकी थी, प्रसारण भी हुआ। श्रोताओं ने लुत्फ उठाया, पर हाय-तौबा नहीं मची। वजह? संस्कृतिकर्मी उन दिनों आदर से देखे जाते थे, उपहास से नहीं। इसीलिए विजय बोस जैसे लोगों ने आकाशवाणी की नौकरी को महज चाकरी नहीं माना। उन्होंने इस मंच का इस्तेमाल समूची सृजनात्मकता के साथ किया। उस वक्त और मौजूदा दौर में सबसे बड़ा फर्क यही है।

प्रोफेशनलिज्म के इस दौर में अपने को तो सभी रचते और गढ़ते हैं, पर ‘बड़े भैया’ जैसे लोग दूसरों के बच्चों को गढ़ने में सारी जिंदगी लगा देते हैं। वे ऐसे कुम्हार की तरह थे, जिन्होंने कच्ची मिट्टी को हर रोज कलाकृति बनाने का काम किया।
आप हमेशा याद रहेंगे बड़े भैया! हर उस शब्द के साथ, जो ध्वनि बनकर हमारे मुंह से निकलता है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:आप हमेशा याद रहेंगे विजय बोस