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बाढ़ पीडितों को 5 साल से आशियाने का इंतजार

बिहार में सदी की सबसे भीषण बाढ़ के पांच साल बीतने के बाद भी सैकड़ों पीडित सरकार से मकान मिलने की आस में अस्थायी आश्रय में दिन गुजारने को विवश हैं।

कारी देवी और रामजी दास जैसे अनगिनत लोग हैं जिन्हें आज भी बिहार सरकार के पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण परियोजना के तहत अपने ध्वस्त हो गए घर को बनाए जाने का इंतजार है।

कोसी की बाढ़ की तबाही झेलने वाले लोग जीने के लिए संघर्ष कर रहे हैं और खुद के बनाए अस्थायी आश्रयों में डेरा डाले हुए हैं। उन्हें उम्मीद है कि बिहार आपदा पुनर्वास एवं पुनर्निर्माण परियोजना (बीएपीईपीएस) के तहत उनके घर बनाए जाएंगे।

मधेपुरा जिले के प्रतापनगर गांव के रहने वाले रामजी (60) ने कहा कि 2012 में करीब 1200 बाढ़ पीडितों के बैंक खाते खोले गए, लेकिन आज तक उनको घर बनाने के लिए एक धेला भी जारी नहीं किया गया है।

मधेपुरा जिले के ही तपरा गांव की विधवा कारी देवी (50) ने भी यही बात बताई। कारी ने बताया, ‘‘अभी तक हम लोगों को घर बनाने के लिए खाते में एक रुपया भी नहीं दिया गया है।’’

अपने संसाधनों से बनाई गई छोटी सी झोपड़ी की ओर इशारा करते हुए रामजी ने कहा, ‘‘सरकार नए तरह के कोसी क्षेत्र के पुनर्निर्माण की बात करती है। लेकिन यह केवल कागजों में ही। सच तो यह है कि सरकार हमारे घर बनाने में विफल रही है। देख लीजिए हम कितनी परेशानी में जी रहे हैं।’’

कारी ने कहा कि पुनर्वास और पुनर्निर्माण में हो रही देरी से बाढ़ पीडितों की उम्मीद टूटती जा रही है। उन्होंने कहा, ‘‘हमें यह पता नहीं है कि सरकार कब हमारा घर बनवाएगी। हम तो बस इंतजार में दिन काट रहे हैं।’’

बिहार के सैकड़ों बाढ़ पीडितों की यह दयनीय दशा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के ‘सुशासन’ की की पोल खोलने के लिए काफी है।

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