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ब्यूरोक्रेट्स और टेक्नोक्रेट्स के बीच फंसा है प्रबंध निदेशक पद

रांची। हिन्दुस्तान ब्यूरो। बिजली बोर्ड बंटवारे के बाद दो नई कंपनियों के प्रबंध निदेशक पर सरकार अब तक फैसला नहीं ले पाई है। दो माह से यह पद ब्यूरोक्रेट्स (आइएएस) और टेक्नोक्रेट्स को लेकर फंस गया है। इस पद के लिए टेक्नोक्रेट्स (इंजीनियर) ने भी अपनी दावेदारी ठोकी है।

प्रबंध निदेशक का पद भरे बगैर योजनाओं का क्रियान्वयन नहीं हो सकता। दोनों कंपनियों के निदेशक मंडल की बैठक के लिए प्रबंध निदेशक का होना जरूरी है। सिर्फ झारखंड ऊर्जा संचरण निगम के प्रबंध निदेशक बीएस झा हैं। वे पीजीसीआइएल से प्रतिनियुक्ति पर आए हैं।

वहीं तीनों कंपनियों का बैंक में भी खाता नहीं खुला है। इससे तीनों कंपनियों के संचालन पर भी सवाल खड़ा हो गया है। .. तो हाथ से निकलेगा 1600 करोड़ बिजली बोर्ड का पुनर्गठन 31 मार्च तक नहीं हुआ तो हाथ से 1600 करोड़ रुपए निकल जाएगा।

वित्तीय पुनर्गठन के तहत केंद्र सरकार 6000 करोड़ रुपए की राशि देगी। इसमें से 1600 रुपए ग्रांट के रूप में दिए जाएंगे। इस राशि से टीवीएनएल और डीवीसी के बकाए का भुगतान किया जाना है। क्या था मुख्य सचवि का निर्देश पांच फरवरी को मुख्य सचवि आरएस शर्मा ने निर्देश दिया था कि सभी कंपनियों को जल्द से जल्द स्वायत्त करें। पावर फाइनांस कॉरपोरेशन(पीएफसी) कर्मचारियों के बंटवारे पर काम शुरू करें। मुख्यसचवि ने तीनों कंपनियों का बैंक में खाता खोलने का भी निर्देश दिया था।

जेएसइबी का जो कॉमन फंड है, उसे तीनों कंपनियों के बीच बांट दिया जाए। संगठन की संरचना को अंतिम रूप देने का निर्देश दिया। डेलीगेशन ऑफ पावर को चहि्नित करने की बात कही थी।

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