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जो बेचते थे दवा-ए-दर्दे-दिल, वो ..

आखिरकार भारत की सबसे बड़ी दवा निर्माण कंपनी और मशहूर बहुराष्ट्रीय उद्यम होन का दंभ पालने वाली रैनबैक्सी बिक गई। पुराना शेर याद आ रहा है, ‘जो बेचते थे दवा-ए दर्दे दिल खोमचा उठाकर बढ़ लिए!’ भूमंडलीकरण का युग बाजारीकरण का है और भला इसमें किसी को क्या शिकायत हो सकती है? क्या हमारे लक्ष्मी मित्तल ने दुनिया भर में दूसरे देशों की कंपनियां खरीद कर नाम नहीं कमाया है? और क्या अंग्रेजों की नाक का बाल समझी जाने वाली जैगुआर और लैंडरोवर बनाने वाली मशहूर मोटर कंपनी को रतन टाटा ने अपनी जेब में नहीं डाल लिया है? इसके पहले भी कई नामी-गिरामी हिन्दुस्तानी कंपनियां विदेशियों ने खरीदी हैं और किसी को परेशानी नहीं हुई। संयुक्त क्षेत्र की मारुति कार कंपनी अब पूरी तरह जापानी है और सुनील मित्तल की एयरटेल कंपनी भले ही अब तक अपनी देशी पहचान बचाये हुए है। हच से हाथ झाड॥कर रूईया परिवार ने इसके मालिकाना हकवोडा फोन को सौंप दिए हैं। बहरहाल पिछले दस-पन्द्रह वर्ष से बड़े जोर-शोर से इस बात का प्रचार किया जाता रहा है। सरकारी और गैर सरकारी दोनों हलकों में कि रैनबैक्सी कंपनी की बात ही निराली है। उसे फार्मा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता और उपलब्धियों का प्रतीक बना कर पेश किया जाता रहा है। फार्मा क्षेत्र में भी रैनबैक्सी के साथ नाम लेने लायक दो-चार ही कंपनियां आज भी याद आती है- सिपला, डॉ़ रेड्डी और ल्यूपिन जैसी। रैनबैक्सी की उपलब्धियां लफ्फाजी की जगमगाती झालर उठाकर तटस्थ भाव से देखने-परखन की कोशिश ज्यादा लोगों ने नहीं की है। 10 वाले दशक में जब भाई मोहन सिंह ने अपने चचेरे या मौसेरे भाइयों की इस कंपनी को अपन कब्जे में लिया था तो उसका कारोबार बहुत छोटे पैमाने पर था और उसकी पहचान एक जापानी दवा निर्माता कंपनी के वितरक के रूप में ही थी। यह बात किसी से छुपी नहीं कि कंपनी को अप्रत्याशित रूप से लाभप्रद बनाने में भाई मोहन सिंह के राजनैतिक संबंध और रसूख काम आये। सरदार मोहन सिंह की कोई रुचि आत्मनिर्भर शोध या मौलिक आविष्कारों को प्रोत्साहित करन की नहीं थी। तत्कालीन पेटेंट प्रणाली का भरपूर लाभ उन्होंने उठाया और अकल की जगह नकल को फायदेमंद समझा। आज विश्व व्यापार संगठन व्यवस्था का सदस्य बनन के बाद भारत अंतरराष्ट्रीय पेटेंट प्रणाली के शिकंजे में कस गया है। जिन्हें पेटेंट से मुक्त जेनेरिक दवाइयां कहा जाता है उन्हें आम आदमी कॉपीकैट ड्रग्स भी कहता है। बड़ी-बड़ी विदेशी फार्मा कंपनियां जिनके पेटेंट समाप्तप्राय हैं। रैनबैक्सी जैसी कंपनियों की नाक में नकेल डालन के लिए थोड़ा-बहुत फेरबदल कर पुरानी दवाइयों के लिए नए पेटेंट जुटाने में माहिर हो चुकी है। इस पद्धति को एवरग्रीनिंग कहा जाता है। यह सारा कारोबार अंतरराष्ट्रीय कानून के विशेषज्ञ वकीलों के लिए ज्यादा फायदेमंद है मरीजों के लिए नहीं। आज भाई मोहन सिंह और उनके पुत्र परविन्दर सिंह दोनों ही कि स्मृतिशेष हैं पर अपने जीवनकाल में कंपनी के स्वामित्व को लेकर बाप-बेट के बीच में भयंकर महाभारत छिड़ा था। परविन्दर सिंह न केवल महत्वाकांक्षी थे बल्कि अपने बलबूते पर ही कुछ कर दिखाना भी चाहते थे। कंपनी का प्रबंध सम्भालन के बाद उन्हीं ने रैनबैक्सी की पहचान विज्ञान और टेक्नोलॉजी के सीमांत पर सक्रिय एक ओजस्वी कंपनी के रूप में बनाई। विदेशी बहुराष्ट्रीय कंपनियों से टकराने में वह कभी कतराये-घबराये नहीं। उन्हें इस अभियान में उनके योग्य सहयोगी डी़एस बरार ने भरपूर मदद दी। कई बार परविन्दर सिंह ने ऐसे जोखिम उठाये जो उनके पिताश्री को रास नहीं आए। परविन्दर सिंह का बुनियादी मतभेद भाई मनमोहन सिंह के साथ यही रहा कि दुनिया बदल चुकी है और उद्योग धंधे में सफलता के लिए अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा की क्षमता का अर्जन जरूरी है। रिश्तेदारी या रसूख की बैसाखी अब किसी काम की नहीं। भाई मोहन सिंह अपने बेटे की स्वाधीनता पचा नहीं सके। उन्होंने बोर्ड में अपने पुराने मित्रों को भरकर बेटे पर अंकुश लगान की कोशिश की। परविन्दर सिंह ने इस सेंधमारी को कामयाब न होने दिया दुर्भाग्यवश कैंसर से पीड़ित परविन्दर सिंह का असामयिक निधन हो गया और बरार साहब भी पारिवारिक प्रबंध से दुखी अन्यत्र चले गये। आज किसी को ताजा सौदे से अचम्भा नहीं हुआ। जो बात जरा अटपटी लगती है वह यह कि मलविन्दर सिंह यह फतवा दे डालने में संयम नहीं बरतते कि ऐसे सौदे ही भारतीय फार्मा उद्योग का भविष्य है। वह सभी के लिए फायदेमंद है, शेयर धारकों के लिए, मालिकों के लिए और कर्मचारियों के लिए। आखिर मुक्त व्यापार के युग में मुनाफा ही सनातन धर्म है और शाश्वत सत्य। इस वक्त यह बेहूदा सवाल कौन उठायेगा भला कि दवा का इस्तेमाल पीड़ित मरीज करते हैं और महंगी दवाइयों को खरीदने से लाचार बीमार लाखों की संख्या में भारत जैसे गरीब देश में जान गंवाते रहते हैं। जब तक विदेशी खरीददार के हाथ हर माल बिकेगा चार आना वाले तरान की धुन पर सौदा नहीं सलटा था तब तक रैनबैक्सी जैसी कंपनियां ही सरकार पर यह दबाव बनाये रहती थी कि भारत की विशेष परिस्थिति को देखते हुए नई पेटेंट प्रणाली को अपने यहां लागू किया जाना अभी कुछ और वर्ष तक स्थगित रखना चाहिए।ड्ढr हमें रैनबैक्सी के बिक जाने स कोई खास रंज नहीं है। इस कंपनी की दवा सूची में प्राणरक्षक दवाइयां नाममात्र ही थी और वैक्सीन भी आम हिन्दुस्तानी के पहुंच से बहुत दूर। रक्तचाप या कोलेस्ट्रॉल घटाने वाली बुढ़ापे में नौजवानी का जोश पैदा करने वाले टॉनिकों या तनाव घटाने वाली चैन की नींद सुला रैनबैक्सी ने सिपला की तरह तीसरी दुनिया के मरीजों के साथ हमदर्दी पालते हुए किसी घाट के सौदे में अपने पैर नहीं पसारे। जब भारत में श्रम कानून और श्रमिकों का अनुशासन मुनाफा कमाने में आड़े आने लगा तो उसने चीन के विशेष निर्यात क्षेत्र में अपने औद्योगिक इकाई स्थापित करने में देर न की। आरम्भ से ही सोवियत संघ और रूस में रैनबैक्सी की मौजूदगी रही है पर वहां भी इसी माल की बिक्री होती थी। वे दवाएं दर्द कम बल्कि दवा-ए-दर्द-ए-दिल ज्यादा थीं। अर्थात लाईफस्टाइल ड्रग्स। रैनबैक्सी के पराये खाते में चले जाने से ज्यादा मायूस होन की जरूरत नहीं। कहीं अधिक फिक्र इस बात की लगी रहनी चाहिए कि यदि दूसरी फार्मा कंपनियों और फिर आईटी कंपनियां शेयरधरकों, मालिकों और कर्मचारियों को मालामाल करन के लिए विदेशियों के हाथ बेच दी जायेंगी तो फिर उदीयमान भारतीय ज्ञान महाशक्ित का क्या बचा रहेगा?ड्ढr

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