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ब्लॉग वार्ता : मास्टर की बात और अदालत की बुरी बला

एक पति अपनी पत्नी से तलाक चाहता है। पति का कहना है कि उसकी पत्नी पर चार प्रेतात्माएं हैं, जो बारी-बारी से चार-चार घंटे उसके शरीर में रहती हैं। यह किसी हिन्दी न्यूज चैनल की प्रेतखोजी पत्रकारिता नहीं है, बल्कि अदालत के भीतर खामोशी से दर्ज मुकदमों का मैच है। संस्मरणों से भरी ब्लॉग की दुनिया में कोई बेजान से मुकदमों में सामाजिक प्रसंग ढूंढ़े तो उसका इरादा भूत-प्रेत के मुकदमों से सनसनी पैदा करना नहीं ही होगा। बात हो रही है कानूनी मुद्दों पर बने ब्लॉग अदालत की। पता है िं’ं३.ु’२स्र्३.ू। लोकेश जानते हैं इंसाफ की तमाम उम्मीदों के बाद भी हमारा समाज अदालत को खास शक और बेकार जगह के रूप में देखता है। इसीलिए इस ब्लॉग की टैगलाइन है- अदालत- यह एक ऐसी जगह है, जहां शायद कोई बार-बार न जाना चाहे। यह बात न होती तो ज्योतिष यह कह कर नहीं डराता कि शनि ने नार फेर ली है, अब कोर्ट-कचहरी का चक्कर लग सकता है। सावधान रहें।ड्ढr हम फैसलों को व्यक्ितगत हार-ाीत के रूप में ही देखते हैं। जबकि इनका मकसद और प्रभाव सामाजिक होता है। लोकेश कर्नाटक हाईकोर्ट के एक फैसले का जिक्र करते हुए विकलांगता के पैमाने की चर्चा भी करते हैं। घुटने तक पैर कटने के बाद भी एक ड्राइवर को मुआवजा नहीं मिला तो कर्नाटक हाईकोर्ट को 1े सुप्रीम कोर्ट के फैसले को ढूंढ़ लाना पड़ा और कहना पड़ा कि ड्राइवर मुआवजे का हकदार है। हमें अदालती फैसलों को भुला देने की आदत है। खबर छपते ही इसका काम पूरा हो जाता है। लेकिन समाज में इसकी उपयोगिता बनी रहती है। लोकेश सुप्रीम कोर्ट की एक और बात का जिक्र करते हैं। जिसमें अदालत ने कहा है कि न तो एक जज द्वारा कही जाने वाली हर बात नाीर हो सकती है, न ही ऊपरी अदालत की सभी टिप्पणियां निचली अदालतों के लिए बाध्यकारी हैं। सिर्फ एक ही चीज बाध्यकारी है, वो है कि फैसला किस सिद्धांत के आधार पर दिया गया है।ड्ढr हमार देश में अदालतों की भाषा फारसी और अंग्रेजी ही रही है। फारसी के तो शब्द भर रह गए हैं, लेकिन अदालतों में अंग्रेजी के वर्चस्व के इस दौर में हिन्दी में लगी यह ब्लॉगिया अदालत कानूनी समझ को बेहतर करती है। तमाम कमियों के बाद प्रारंभिक जानकारियां तो मिल ही जाती हैं।ड्ढr लोकेश अखबार की कतरनों से कानून को उठा कर यहां चस्पा कर देते हैं। छत्तीसगढ़ के भिलाई के लोकेश पूर देश के अदालती फैसलों पर नजर रखते हैं। हिन्दी ब्लॉग की दुनिया में उत्तर प्रदेश के फतेहाबाद का एक प्राइमरी मास्टर भी कूद गया है। प्रवीण त्रिवेदी के इस ब्लॉग का नाम है प्राइमरी का मास्टर और पता है : स्र्१्रं१८‘ं२३ी१.ु’२स्र्३.ू। मुझे यह ब्लॉग काफी दिलचस्प लगा है। यूपी में इसी साल दसवीं और बारहवीं में लगभग बीस लाख बच्चे फेल हुए हैं। जाहिर है शिक्षा व्यवस्था पर नए सिर से देखने की जरूरत है।ड्ढr प्रवीण त्रिवेदी लिखते हैं कि प्राइमरी स्कूल में कार्य कर रहे अध्यापकों से जुड़ी समस्याओं और छवियों को लेकर अंतर्द्वद्व का ही परिणाम है, मेरा ब्लॉग। कहते हैं कि प्राइमरी के मास्टर की सबसे बड़ी समस्या है वह खुद को अपडेट नहीं रख पाता, वहीं जनमानस को चाहिए कि प्राइमरी मास्टर के प्रति अपने पूर्वाग्रहों को अपने मन से हटा दे। बात में दम है। मास्टरों को स्कूली शिक्षा का नौकर समझने वाले समाज में प्रवीण मास्टर की आवाज मुखर होती जा रही है।ड्ढr प्राइमरी का मास्टर ब्लॉग जब मूल्यांकन पर बहस करता है तो एक टीचर की बेचैनी झलकती है। कहते हैं मूल्यांकन का मकसद यह होना चाहिए कि छात्र एक कौशल से दूसर कौशल में खुद को विकसित करने की सोच सके। कई स्कूल आपस में मिलकर अपने शिक्षकों का भी मूल्यांकन करं।ड्ढr फतेहपुर जनपद का एक मास्टर का अनुभव दिल्ली में होने वाली बहसों से हटकर ताजगी भरा लगता है। प्रवीण कहते हैं, अगर बच्चे उस तरह से सीख नहीं पाते, जिस तरह से उन्हें सिखाया जाता है तो क्यों न उन्हें उस तरह से सिखाया जाए, जसे वो सीख सकें। हिन्दी में इस तरह की बुनियादी बहस की आदत नहीं। संस्मरण और साहित्य का इतना कब्जा है कि इस एक ब्लॉग के आने से पाठकों की प्रतिक्रिया देखते बनती है। फोन्ट की गलतियों के बाद भी टिप्पणीकार मास्टर ब्लॉगर का उत्साह बढ़ाते हैं। धीर-धीर पाठक एक टीचर की समस्या के प्रति सहानुभूति व्यक्त करने लगते हैं और शिक्षा पर हो रही बहस, बहस का हिस्सा बन जाते हैं।ड्ढr ं

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