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पंचायती राज: अधिकार के लिए मारामारी

हीं अधिकार के लिए आपाधापी तो कहीं अफसरों के साथ मारामारी। दूसरी तरफ कहीं अफसरों के साथ ऐसी यारी कि दोनों ने साथ-साथ कमीशन उड़ाया और साथ में ही जेल की हवा भी खाई। शिक्षामित्रों की नियुक्ित और बाढ़पीड़ितों के लिए विशेष इंदिरा आवास देने के मामले में बीडीओ और मुखिया के बीच की दोस्ती के किस्से घर-घर में चर्चा ए आम थे। नौकरशाह पंचायतों के लिए अधिकार छोड़ना नहीं चाहते और इसका नतीजा यह होता है कि पंचायती राज प्रतिनिधि और अफसर आपस में ऐसे जूझते हैं कि राज्य सरकार परशान हो जाती है। कई बार उन दोनों के बीच लड़ाई का फैसला अदालत को करना पड़ता है।ड्ढr ड्ढr गया जिला परिषद की अध्यक्ष और मगध प्रमंडल के आयुक्त में ऐसी भिड़ंत हुई कि राज्य सरकार की जान सांसत में पड़ गई। आखिर में मामला उच्च न्यायालय गया तो सुलझा। पटना की एक महिला सरपंच ने जब गांव की लड़ाई में फैसला सुनाया तो पुलिस ने उनके पति के खिलाफ धारा107 के तहत मुकदमा कर दिया। पिछले वर्ष बेगूसराय जिले के भगवानपुर प्रखंड में पंचायती जनप्रतिनिधि और नौकरशाह ऐसे उलझे कि दोनों एक-दूसर के खिलाफ सड़क पर आ गये। प्रखंड कार्यालय पर जनप्रतिनिधि बीडीओ के खिलाफ धरना पर बैठे तो बीडीओ साहब भी कर्मचारियों को लेकर पंचायती राज प्रतिनिधियों के खिलाफ धरना पर बैठ गए। इसी जिले के तेघड़ा प्रखंड में सीडीपीओ और पंचायती राज प्रतिनिधियों के बीच मचा घमासान पूर राज्य में चर्चा का विषय बना रहा। दूसरी तरफ बाढ़पीड़ितों के लिए विशेष इंदिरा आवास देने के मामले में बीडीओ और जनप्रतिनिधियों के बीच ऐसी यारी हुई कि कई लोग जेल गए और कई के खिलाफ मुकदमे अभी तक चल रहे हैं।ड्ढr ड्ढr यह हालत इसलिए हुई है कि अब तक पंचायतों के लिए राज्य सरकार ने कोई सुव्यवस्थित कायदा नहीं बनाया है। पिछले वर्ष सीएजी ने पंचायतों के आय-व्यय की जांच की तो यह देखकर हैरत में रह गए कि वहां हिसाब-किताब की कोई व्यवस्था ही नहीं है। राज्य सरकार को 2विभागों के काम पंचायतों को सौंप देने थे। लेकिन इस मामले में चिठ्ठी-पत्री छोड़कर और कुछ हुआ ही नहीं है। राज्य सरकार के आला अधिकारियों का तर्क है कि जब तक पंचायतें सक्षम नहीं हो जातीं तब तक उन्हें विभागीय काम सौंपे ही नहीं जा सकते हैं। यह प्रक्रिया के तहत धीरे-धीरे होगा।

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