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आरक्षण की रवड़ी

राजस्थान में गुर्जर समुदाय के आरक्षण को लेकर हुए समझौते के बाद राहत महसूस करना स्वाभाविक है। 27 दिनों तक चले गुर्जर आंदोलन के दौरान न सिर्फ राज्य के अनेक इलाकों में जनजीवन अस्त-व्यस्त रहा था, बल्कि हिंसा-आगजनी से जानमाल और अरबों रुपए के कारोबार का भी नुकसान हुआ। समझौते के फॉर्मूले से साफ है कि गुर्जरों को अलग से पांच फीसदी आरक्षण दिए जाने से वसुंधरा सरकार ने एसटी कोटे में आने वाले मीणा समुदाय की नाराजगी टाल दी और लगे हाथ गरीब सवर्णो को 14 प्रतिशत आरक्षण देकर सवर्ण वर्गो में असंतोष फैलने की आशंका पर भी रोक लगाई है। आंदोलनकारियों और विपक्षी पार्टियों की मौन, गुपचुप या प्रकट घेरबंदी को तोड़ते हुए मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे ने बड़ी चतुराई के साथ आरक्षण की रवड़ी बांटी है। कहा जा सकता है कि जब सिर्फ 5 माह बाद राज्य में विधानसभा चुनाव होने वाले हों और विपक्षी दलों के नेता आंदोलन की आड़ में सियासी खेल खेल रहे हों तो उनके सामने इससे बढ़िया और क्या विकल्प हो सकता था? लेकिन, गुर्जर आंदोलन के दौरान भाजपा सहित लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों का दिवालिया सोच और वोट बैंक की राजनीति खेलने का खतरा फिर उाागर हुआ है। आरक्षण पर कोई भी राजनीतिक दल न तो अपना सैद्धांतिक रुख स्पष्ट करने को तैयार दिखा, न ही सर्वदलीय सहमति की पहल सामने आई- सभी आंदोलन की आड़ में अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते दिखाई दिए। आंदोलन के दौरान जनता ने यह भी देखा कि जिस समुदाय के पास बाहुबल और जोर-ाबर्दस्ती करने की ताकत है, वह चाहे तो सरकार को झुकने और अपनी मांगें मंजूर करने पर मजबूर कर सकती है। किसी को यह सोचने की फुर्सत नहीं है कि इस तरह के आरक्षण देने का कोई तर्कसंगत या वैधानिक आधार है या नहीं।ड्ढr सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले में अधिकतम 50 प्रतिशत आरक्षण देने की सीमा बांध रखी है। अब तक सिर्फ तमिलनाडु ने यह सीमा लांघकर 6प्रतिशत आरक्षण दिया था, लेकिन उसे नौवीं सूची में डालकर पर्दा डाला गया और यह मामला अभी भी कोर्ट के विचाराधीन है। राजस्थान में अब 68 प्रतिशत आरक्षण हो जाएगा। क्या यह व्यवस्था कानूनी व संवैधानिक रूप से वैध होगी? व्यावहारिकता के तकाजे का सवाल अलग से कायम है।ड्ढr ं

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