अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

मतभेद के आग

ेंद्र की संयुक्त प्रगतिशील सरकार अपने परमाणु विखंडन की ओर बढ़ सकती है। अखबारों में छपी ये सुर्खियां भले ही किसी आफ द रिकॉर्ड ब्रीफिंग से निकली हों, लेकिन परमाणु करार को लेकर वामपंथी दल जिस चाल चल रहे हैं उससे तो हालात इसी ओर जाते दिख रहे हैं। इस करार की खूबियों, खामियों और जरूरत पर यह देश एक लंबे समय से बहस कर रहा है, इसलिए जाहिर है कि बुधवार को जब विदेश मंत्री प्रणव मुखर्जी और वाम नेता मिले होंगे तो इन खूबियों, खामियों पर तो बात नहीं ही हुई होगी। इस मसले पर दोनों के रुख और मतोद जगजाहिर हैं, जिसे बदलने को दोनों में से कोई भी तैयार नहीं है। मसला अब उस जगह पर है जहां से मतोदों के बावजूद आगे बढ़ने का रास्ता निकाला जा सके। मसला अब विचारधारा का नहीं अगले आम चुनाव का है, या फिर इस मसले पर दोनों की जिद के चलते सरकार के अचानक टपक पड़ने का है। यह खतरा भी सभी को सता रहा है कि अगर विखंडन सचमुच हो गया तो उससे पैदा हुई ऊरा कहीं विपक्ष को सत्ता की ओर न उछाल दे। कांग्रेस और वामपंथी दोनों ही यह जानते हैं कि करार हो या न हो, लेकिन जब चुनाव होंगे तो केरल और पश्चिम बंगाल में दोनों को एक दूसर के खिलाफ ही खड़े होना है। यानी उनकी दोस्ती का अफसाना चुनाव के अंजाम तक नहीं पहुंच सकता, इसलिए परमाणु करार इसे एक खूबसूरत मोड़ देने का बहाना बन सकता है। और विखंडन के बाद भी सरकार नहीं गिरगी इसके संकेत वामपंथी दलों ने दिए ही हैं। इस राजनीति के कई फामरूले भी सुझाए जा रहे हैं। उन्हें छोड़ भी दें तो पेट्रोलियम संकट से जूझ रही दुनिया में भविष्य के लिए ऊरा के विकल्प जिस तरह कम हो रहे हैं उसमें परमाणु ऊरा ही एकमात्र टिकाऊ रास्ता नजर आने लगा है। भारत के लिए परमाणु करार इस भविष्य की ओर खुलने वाली एक खिड़की है। इस मसले पर सरकार गिर यह कोई नहीं चाहेगा। लेकिन अतीत से निकले वामपंथी पूर्वाग्रहों के चलते भविष्य को दांव पर लगाना भी बुद्धिमानीड्ढr नहीं है।ड्ढr

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: मतभेद के आग