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राजरंग

ानता के पक्ष में है कि सरकार के..किसी जमाने में संथाल के प्रोफेसर साहब को सरकार के खिलाफ लेक्चर देने का जिम्मा मिला था। हर लेक्चर में जनता के हित की बात होती थी। फिर समय के साथ स्थितियां बदलीं। जनता की समस्या सुलझाने का जिम्मा प्रोफेसर साहब के ही सिर पर आ गया। सरकार के खिलाफ बोलते-बोलते सरकार में आ गये। नीतियां तय करने और शासन चलाने में आगे रहते हैं। पर सरकार के काम-काज का तरीका उन्हें नहीं भाता। मजबूरी में सीधे नहीं बोल पाते। दबी जुबान से आलोचना करते हैं। मांझी मैडम, शाहों के शाह और बंधु बांधव के साथ जब न तब गोपनीय बैठक कर लेते हैं। बैठक में कहते हैं, बहुत हो गया। गाड़ी पटरी पर नहीं आ रही है। इसका नुकसान हम लोगों को होगा। फिर सरकार पर जब संकट आता है, उसे बचाने के लिए भी प्रोफेसर साहब आगे आ जाते हैं। अभी गैस सिलिंडर के दाम घटा कर जनता की सहानुभूति हासिल कर ली। उनकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि किसी को नाराज नहीं करना चाहते। इस कारण यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वे सरकार के पक्ष में हैं या जनता के..? उन्हें सरकार बचाने की चिंता है या जनता के दुख-दर्द मिटाने की?ड्ढr

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