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वैज्ञानिक खेती के गुर सीखा रही ‘पारादीप’

ांके प्रखंड अंतर्गत इचापीढ़ी और नवाडीह में खेती-बारी का तौर-तरीका बदल रहा है और इसके साथ ही बदल रही है किसानों की तकदीर। यह संभव हो रहा है पारादीप फास्फेट कंपनी लिमिटेड की मदद से। कंपनी ने इन दो गांवो को एडॉप्ट किया है। यहां किसानों को उन्नत और वैज्ञानिक खेती के गुर सीखाये जा रहे हैं।ड्ढr कंपनी के मार्केटिंग उपाध्यक्ष जगदीश बरगले कहते हैं कि हमारा लक्ष्य सिर्फ खाद बेचना नहीं, बल्कि किसानों की दशा सुधारना भी है। कंपनी के विशेषज्ञ इन दोनों गांवों के किसानों को वैज्ञानिक तरीके से खेती करने के उपाय बता रहे हैं। इन दोनों गांवों में मिट्टी जांच अभियान, किसान मीटिंग, मशरूम की खेती आदि का प्रशिक्षण दिया जा रहा है। किसानों को आय बढ़ाने के लिए भी सुझाव दिये जा रहे हैं।ड्ढr उन्हें बताया जाता है कि कम संसाधनों में कैसे पैदावार बढ़ायी जा सकती है और कैसे मिट्टी की उर्वरा शक्ित को स्थिर रखा जा सकता है। इसी तरह संताल परगना के माथाकेसो गांव में भी किसानों को प्रशिक्षित किया जा रहा है। यहां भी बेहतर नतीजे सामने आये हैं।झारखंड में सबसे आगे है पारादीप फास्फेट: बरगलेड्ढr पारादीप फॅास्फेट्स लि. के मार्केटिंग उपाध्यक्ष जगदीश बरगले ने कहा है कि डीएपी एवं कांप्लेक्स फर्टिलाक्षर में पारादीप फास्फेट्स लि. देश की अग्रणी कंपनी है। इसके उत्पादन में लगातार वृद्धि हो रही है। 2001 में जब इस कंपनी को केके बिड़ला ग्रुप ने लिया, तो उस समय इसकी उत्पादन क्षमता साढ़े सात लाख टन थी, जो वर्ष 2007 में बढ़ कर 13 लाख 8 हाार टन हो गयी। इस कंपनी का मार्केट पूर हिंदुस्तान में है। यूपी, उत्तरांचल, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड आदि में इसकी अपनी पहचान है। बरगले गुरुवार को प्रेस से बात कर रहे थे।ड्ढr उन्होंने बताया कि झारखंड में बिक्री की दृष्टि से कंपनी का स्थान अग्रणी है। डीएपी एवं कांप्लेक्स खाद में 40 प्रतिशत मार्केट शेयर है। कुल एक लाख 11 हाार टन की बिक्री में पीपीएल का हिस्सा 45 हाार टन का है। उन्होंने कहा कि हम असली और नकली डीएपी की पहचान किसानों को बताते हैं। उन्होंने कहा कि केके बिड़ला की इस कंपनी का मोटो है - गुणवत्ता के साथ कोई समझौता नहीं। उन्होंने बताया कि डीएपी का अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव करीब 54 हाार रुपये प्रति टन है, जबकि किसानों को नौ हाार 350 रुपये प्रति टन के हिसाब से दिया जा रहा है। शेष राशि भारत सरकार फर्टिलाक्षर कंपनियों को सब्सिडी के रूप में देती है। इस अवसर पर कंपनी के झारखंड क्षेत्रीय प्रबंधक पीके फणी एवं राजेश आयंकरड्ढr उपस्थित थे।

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