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कांग्रेस की कलह

मुंबई में सोनिया गांधी की उपस्थिति में कांग्रेस कार्यकर्ताओं की रैली में जो घमासान हुआ है वह महाराष्ट्र में कांग्रेस की स्थिति पर तो प्रकाश डालता है। जाहिरा तौर पर रैली में शोरगुल और हाथापाई की वजह नारायण राणे के समर्थकों का मुख्यमंत्री विलासराव देशमुख के प्रति असंतोष और अपनी शक्ित का प्रदर्शन था, लेकिन यह महाराष्ट्र में कांग्रेस के कामकाज के ठीक-ठाक न होने का भी संकेत है। महाराष्ट्र कांग्रेस में कई नेता व कई गुट हैं। नारायण राणे के आने के बाद एक ताकतवर नेता और उग्र गुट और बढ़ गया है। फिलहाल महाराष्ट्र के सबसे ज्यादा प्रभावशाली नेता शरद पवार हैं, जो ताकतवर मराठा जाति के हैं। विलासराव देशमुख न प्रभावी प्रशासक हैं न ही राजनेता, वे सिर्फ इसलिए मुख्यमंत्री हैं कि वे मराठा हैं और उनकी जगह किसी दूसरे को मुख्यमंत्री बनाने का अर्थ सारी मराठा ताकत को शरद पवार के हाथों में सौंप देना है, लेकिन यह संदेश भी कांग्रेस देना नहीं चाहती कि वह देशमुख को एकछत्र राज सौंप रही है क्योंकि इससे दूसर महत्वाकांक्षी नेता नाराज हो जाएंगे, इसलिए लगातार देशमुख को हराने की चर्चाएं भी चलती रहती हैं। नारायण राणे शिवसेना के मुख्यमंत्री रह चुके हैं और संभव है कि कांग्रेस में उन्हें कुछ आश्वासन मिला होगा। अब इसमें सुशील कुमार शिंदे, प्रदेश अध्यक्ष प्रभा राव और प्रदेश प्रभारी मार्गरट अल्वा जसे और नेताओं की पसंद-नापसंद और महत्वाकांक्षाओं को जोड़ लिया जाए तो एक अच्छा खासा घालमेल सामने आता है। खतरनाक यह है कि यह सब कुछ सोनिया गांधी की उपस्थिति में हुआ है। इससे यह पता चलता है कि कांग्रेस की राजनीति की मौजूदा शैली लगातार बेअसर होती जा रही है। कांग्रेस को अपनी शैली को ज्यादा स्पष्ट, लोकतांत्रिक और जमीनी बनाना होगा और विभिन्न नेताओं के बीच संतुलन बनाने के खेल को छोड़ना होगा वरना एक टूटा-फूटा शिवसेना-भाजपा गठबंधन भी उसके लिए भारी पड़ सकता है। याद रखने की बात यह है कि सार्वजनिक स्तर पर घमासान को छोड़ दिया जाए, तो कांग्रेस के लिए कमेाबेश से ही समस्याएं तमाम राज्यों में हैं।

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