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इतिहास : महापुरुषों से प्रेरणा का किफायती रास्ता

महाराष्ट्र सरकार मुम्बई के मरीन ड्राइव में समुद्र के एक किलोमीटर भीतर अरब सागर के बीचों-बीच शिवाजी की एक मूर्ति स्थापित करने जा रही है। 200 करोड़ रुपए की लागत से बनने वाली 30ीट ऊँची यह मूर्ति अमेरिका के स्टेच्यू ऑफ लिबर्टी से भी ऊँची होगी। केतकर ने अपने लेख में इसे जनता के पैस का दुरुपयोग बताया और कहा कि योजना राजनीतिक लाभ की भावना से प्रेरित है। दरअसल केतकर सही जगह चोट कर रहे थे और इसीलिए निशाना बनाये गए। भारतीय राजनीति में कोरे भावुक मुद्दों को वैचारिक आधार बनान की प्रवृत्ति का यह एक उदाहरण है। इसके लिए इतिहास को आधार बनाया जाता है। जनता की इतिहास की समझ आधी-अधूरी और तमाम भ्रामक व्याख्याओं के बीच विकसित होती है। राजनीतिक दल उनकी इस कमजोरी का फायदा उठा लेते हैं। ऐतिहासिक चरित्रों को माध्यम बनाया जाता है भले ही उनके वास्तविक संदेश, योगदान और जीवन आदशरें को कितना ही तोड़-मरोड़ क्यों न दिया जाए। महाराष्ट्र सरकार भी यही करन का प्रयास कर रही है। सत्रहवीं सदी के उत्तरार्ध मे शिवाजी ने दक्कन के भीतर मुगल साम्राज्य के विस्तार को रोक दिया था और एक स्वतंत्र मराठा राज्य की स्थापना की थी। ज्ञानेश्वर, नामदेव, एकनाथ, तुकाराम और समर्थ गुरु रामदास जैसे समाजसुधारक मराठी भक्ित संतों की परम्परा ने उनकी वैचारिक पृष्ठभूमि का निर्माण किया था। इन मराठा संतों ने अपनी वाणी से सामाजिक भेद-भावों से ऊपर उठ कर एक बनन का संदेश दिया था। शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास की प्रेरणा से बुरी तरह विभाजित मराठी प्रदेश को एकजुट करके एक स्वतन्त्र राज्य में तब्दील कर दिया था। इस भावना को राजनीतिक स्तर पर साकार कर दिया। इसीलिए मराठी लोकस्मृति में शिवाजी मराठी प्रदेश की सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के सम्मिलित प्रतीक के रूप में जीवित हैं। परन्तु इससे सरकार द्वारा उनकी विशालकाय मूर्ति लगान की खर्चीली परियोजना को सही सि करन का कोई औचित्य नहीं बनता। दूसरी ओर महाराष्ट्र में विपक्षी दल शिवसेना शिवाजी का नाम बड़ी बेशर्मी से साम्प्रदायिकता के साथ जोड़े हुए है। जबकि ऐतिहासिक तथ्य यह है कि मराठा संत परम्परा से प्रेरित शिवाजी धार्मिक रूप से अत्यन्त उदार थे। उनकी उपाधियों श्हैंदव धर्मोरकश और हिन्दू पद पादशाही को आज की हिन्दूवादी परिभाषाओं से नहीं समझा जा सकता। क्योंकि शिवाजी मध्यकालीन भारत के उस दौर में सक्रिय थे जबकि अपनी राजसत्ता को मजबूत बनान के लिए धर्म का सहारा लेना आम बात थी। हिन्दू हो या मुसलमान सभी शासकों ने यह किया था। लकिन इसका यह अर्थ कतई नहीं है कि शिवाजी हिन्दुओं के नेता थे और मुसलमानों के विरु हिन्दू धर्म की रक्षा के लिए लड़ रहे थे। इसके विपरीत वे दक्कन में एक स्वतन्त्र मराठा राज्य की स्थापना करना चाहते थे। उन्हें मुगलों या दक्कन के अन्य मुसलमान शासकों के धर्म स कोई बैर न था और उनसे शिवाजी की लड़ाई खालिस राजनीतिक लड़ाई थी। शिवाजी के हृदय में अन्य धमोर्ं के प्रति अथाह सम्मान था। लड़ाई के दौरान जब कहीं उन्हें कुरान शरीफ की कोई प्रति मिलती थी तो वे उसे बड़े जतन से सहेज कर रख लेते और अपनी सेना के मुसलमान सैनिकों को पढ़ने के लिए दे देते थे। उन्होंने कभी मस्जिदों को नुकसान नहीं पहुंचाया बल्कि उनके निर्माण और मरम्मत के लिए आर्थिक सहायता दी। सूफियों और पीरों के लिए उनका खजाना हमेशा खुला रहता था। उनकी सेना और नौसेना में मुसलमान भी शामिल थे और पठानों की एक सैनिक टुकड़ी उनकी विशेष ताकत थी। इस तरह शिवाजी की जो छवि आज आम जनता के सामने बनाई गई है वास्तव में वे उसस कहीं अलग और अधिक महान थे। शिवसेना जैसे साम्प्रदायिक संगठन उनकी विरासत को सहेजन का दावा कतई नहीं कर सकते। धार्मिक देवी-देवताओं की मूर्तियों और मन्दिरों तथा निकट अतीत के ऐतिहासिक व्यक्ितत्वों की मूर्तियों और स्मारकों के निर्माण में जमीन-आसमान का अन्तर है। शिवाजी, महाराणा प्रताप, अकबर, कबीर हो या फिर गांँधी, नेहरू, भगत सिंह या अम्बडकर, उनकी मूर्तियां लोगों के भीतर उनके प्रति अन्धभक्ित और अन्धश्रा ही पैदा कर सकती हैं। जबकि सबसे बड़ी जरूरत उनके ऐतिहासिक अध्ययन और शोध को बढ़ावा देन की है, ताकि उन ऐतिहासिक व्यक्ितत्वों द्वारा इतिहास के निर्माण में किये गये योगदान को बेहतर ढ़ंग से समझा जा सके। ऐतिहासिक व्यक्ितत्वों से सीख लेने और प्रेरित होन का यह कहीं बेहतर और कम खर्चीला रास्ता है।ड्ढr लेखक इतिहास के शोधार्थी हैं

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