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ईशावास्यमिदं सर्वम्..

गंगोत्री में आप गुजराती आश्रम में ठहर जाइए। हमसे कहा गया था। पूछते-पाछते हम उस आश्रम पहुंचे थे। लेकिन वह तो ईशावास्य आश्रम था। लेकिन लोगों ने उसे गुजराती आश्रम बना डाला था। स्वामी राघवानंद जी को उसे लेकर कसक भी थी। ईशोपनिषद के उस महान श्लोक के महामंत्र पर नामकरण के बावजूद लोगों ने उसे निहायत प्रादेशिक नाम दे डाला था। क्या महामंत्र है वह? ईशावास्यमिदं सर्वम्, यत् किम् च जगत्यां जगत्। यानी दुनिया में जो कुछ भी है, वह ईश्वर का है। ईशावास्य तो अपने में एक दर्शन है। यह दुनिया प्रभु की है। इसे मानते ही हमारी पूरी दुनिया बदल जाती है। हम तब दुनिया को बहुत आदर के साथ देखते हैं। उसे प्रभु कृपा की तरह लेते हैं। उसे इस्तेमाल की चीज नहीं समझते। हमें भी प्रभु ने बनाया है। सो, हम अपना आदर भी करते हैं। दुनिया प्रभु की है, तो उसका किसी मायने में अनादर नहीं करते। यही वजह है कि हम किसी को बेवजह छोटा-बड़ा नहीं समझते। किसी से नफरत करने की बात ही कहां उठती है? तब आपके जेहन में बस ‘कण-कण में हैं भगवान’ रहता है। अगर हम दुनिया से कुछ लेते हैं, तो उसे देने की कोशिश भी करते हैं। हमें जिंदगी में जितना मिला है, कम से कम उतना तो लौटाने की कोशिश करते हैं। कोई हमारी देखरख करता है। हम किसी की देखरख करते हैं। हम जब दुनिया में आते हैं, तो कितनी-कितनी चीजें हमें यों ही मिल जाती हैं। मनुष्य के जन्मते ही हाारों सालों की सयता हमसे जुड़ जाती है। अगर हम उसके नाम पर जिंदगी जीते हैं, तो गांधीजी के ट्रस्टीशिप सिद्धांत पर चले जाते हैं। अक्सर हमसे गड़बड़ियां अपने को लेकर होती हैं। जब हम उसके लिए कुछ करते हैं, तो अपने से ज्यादा दूसरों की सोच रहे होते हैं। तब हम वैष्णव जन की परंपरा से जुड़ जाते हैं। उस सयता में अपना योगदान देते हैं। यह हम तभी करते हैं, जब ईश के वास को इतना महत्व देते हैं।

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  • Web Title: ईशावास्यमिदं सर्वम्..