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शिक्षा के मंदिरों में भेदभाव के पहाड़

अपने अधिकारों की स्थिति जानने का बीड़ा खुद बच्चों ने उठाया तो सरकारी प्रयासों की कलई खुल गई। मामला उत्तराखंड का है। बाल पत्रकारों के रुप में बच्चों ने राज्य के 13 जिलों के 144 गांवों के प्राइमरी स्कूलों का दौरा किया तो बेहद खराब अनुभव हुए। शिक्षा के मंदिरों में भी बच्चे जाति के आधार पर बंटे दिखे। शहरों के करीब जिन गांवों में निजी स्कूल खुले हैं, वहां अभिभावकों ने खुद ही अपने बच्चों में लैंगिक भेदभाव पैदा किया। बेटे को प्राइवेट और बेटी को सरकारी स्कूल भेजकर। स्कूलों में दोपहर के भोजन के वक्त साफ हो जाता है कि समाज में कितना जातिवाद घुला है क्योकि बच्चे अलग-अलग समूहों में बैठ भोजन करते हैं। टिहरी के अंजलिसैंण में स्थित भुवनेश्वरी महिला आश्रम ने प्लान इंटरनेशनल के साथ मिल सव्रेक्षण किया। मकसद है संयुक्त राष्ट्र संघ बाल अधिकार समझौते पर उत्तराखंड के बच्चों की वैकल्पिक रिपोर्ट तैयार करना। स्कूलों में 8315 बच्चे और 275 टीचर हैं। 30 बच्चों पर एक टीचर, औसत अच्छा है, लेकिन अनेक स्कूलों में स्थिति खराब है। मसलन, अल्मोड़ा के मझेड़ा गांव में स्कूल में 12 बच्चे हैं और तीन टीचर। लेकिन इसी जिले के खुलीना गांव में 65 बच्चे हैं और एक टीचर। मझेड़ा शहर के निकट है और खुलीना बेहद दूर। टीचर दूर के स्कूल में नहीं जाना चाहते। दूसरी बानगी, टिहरी के जकिनधर ब्लाक में 10 स्कूलों में 223 लड़के पढ़ते हैं जबकि लड़कियों की संख्या 247 है। रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लाक के 10 स्कूलों में 114 लड़के और 153 लड़कियां हैं। यह लड़कियों के अच्छे अनुपात का संकेत नहीं है। यहां प्राइवेट स्कूल भी हैं और लोग लड़कों को उनमें भेज रहे हैं, बेटियों के लिए सरकारी स्कूल ही ठीक हैं। पिथौरागढ़ जिले के अस्कोट के एक सरकारी स्कूल में 17 लड़के और 3लड़कियां हैं लेकिन यही के एक निजी स्कूल में 73 लड़के और 48 लड़कियां हैं। फर्क साफ नजर आता है।

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