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भ्रष्टाचार के खिलाफ गवाही जेब पर पड़ रही भारी

पटना। हिन्दुस्तान ब्यूरो। भ्रष्टाचार के मामलों में विभागीय कार्यवाही के दौरान गवाही देना भारी पड़ रहा है। विभागीय कार्यवाही में सरकारी मुलाजिम की गवाही एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है। बगैर गवाही के विभागीय कार्यवाही में संचालन अधिकारी कोई निर्णय नहीं ले पाते हैं। पर सरकारी महकमे गवाहों को तरजीह नहीं दे रहे।

गवाहों की दिक्कत अक्सर यह शिकायत मिलती है कि जो लोकसेवक फंसा होता है, वह गवाहों को रोकने का खूब प्रयत्न करता है। गवाही नहीं हो पाने की वजह से मामला अटका रहता है। विभागीय कार्यवाही के संचालन अधिकारी के स्तर से कई बार गवाही में आने का पत्र भेजने पर भी जब गवाह नहीं पहुंचता है तो फिर संचालन अधिकारी भी थक कर बैठ जाता है। गवाहों को बुलाने को ले सरकार की ओर से किसी भी तरह के खर्च का प्रावधान नहीं है।

गवाही के लिए नियत जगह पर आने में गवाहों को किराया समेत अन्य खर्च का वहन खुद करना पड़ता है। अगर गवाह को किसी दूसरे शहर से आना है तो उसके रात को ठहरने, और खाने पर भी खर्च करना पड़ता है। बहुत से मामले में गवाह सरकारी कर्मी रिटायर हो चुके हैं। रिटायर होने के बाद वह कहां रह रहे हैं, इसकी भी पुख्ता जानकारी संबिंधत महकमे को नहीं होती है। ऐसे में विभागीय कार्यवाही फंस जाती है। भ्रष्ट लोकसेवक इस अविध में मौज में रहता है।

पुरानी फाइल बंद होने की स्थिति में आ जाती है। नहीं ली जाती नोटिस पुलिस महकमे के एक आला अधिकारी ने बताया कि औसतन पचास गवाह हर रोज पहुंच रहे हैं। बहुत जगहों पर यह शिकायतें मिल रही हैं कि दूर से पहुंचे गवाहों को नोटिस नहीं लिया जाता है। कई-कई बार तो तय समय में गवाही भी नहीं होती है। ऐसे में खीझ कर वे वापस लौट जाते हैं।

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