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हमारा आदर्श

वह हमेशा ऑफिस के लिफ्टमैन को सर कहते थे। एक दिन लिफ्टमैन ने पूछ ही लिया, आप ऐसा क्यों कहते हैं, जबकि आप इतने सीनियर हैं? जवाब में उन्होंने कहा, आप मेरे आदर्श हैं सर। आप हमेशा मीठी आवाज में बात करते हैं, आप हमेशा समय पर मौजूद होते हैं, आप सबसे ऐसे मिलते हैं, जैसे पुरानी जान-पहचान हो..। उनका आदर्श यदि एक लिफ्टमैन हो सकता है, तो फिर हमारे आसपास मौजूद आम लोगों में से कोई क्यों नहीं हो सकता? हम अमूमन आदर्श के तौर पर ऐसे लोगों को तलाशते हैं, जो सफल हों। सफलता कैसी? रुतबा बड़ा हो, जिनके पास खूब पैसे हों, जिनकी तस्वीरें अखबारों में छपती हों, वगैरह। मेनी फेसेस ऑफ इविल: हिस्टोरिकल प्रोस्पेक्टिव  जैसी मशहूर किताब लिख चुकी एमिली रॉटी कहती हैं, प्राचीन दार्शनिक से लेकर आधुनिक तत्वज्ञानी तक मानते हैं कि अच्छाइयों के साथ बुराइयों का अस्तित्व हमेशा रहा है। ऐसे में, किसी को बुराई से अछूता मान लेना अति-आदर्शवाद के उस स्तर तक पहुंच जाना है, जहां हम उसे इंसान न समझने की भूल कर बैठते हैं।

हाई फ्लायर्स  जैसी किताब के लेखक मॉर्गन डब्ल्यू मैक्कॉल जूनियर कहते हैं, ऊंचाई पर बैठे किसी भी व्यक्ति पर विचार करते समय इस तथ्य को न भूलें कि अनैतिक रास्ते सफलता तक जल्दी पहुंचाते हैं। पर इसका मतलब यह नहीं है कि नैतिकता को सफलता के रास्ते की बाधा माना जाए। मॉर्गन कहते हैं, नैतिकता धैर्य के साथ बहुत कुछ खो देने की मांग करती है, इसके बावजूद सफलता की कोई गारंटी नहीं होती। पर व्यक्ति यदि नैतिकता को लेकर दृढ़ है, तो वह उसी के साथ संतुष्ट रहता है। मनोवैज्ञानिक ईवी समिड के मुताबिक, आदर्श का चयन अच्छाई-बुराई के आधार पर होना चाहिए, उस द्वारा गढ़ी गई छवि के आधार पर नहीं। आपका पड़ोसी जो जीवन से बहुत संतुष्ट है, आपका आदर्श हो सकता है। कूरियर वाला, जो समय पर आप तक डाक पहुंचाता है, वह भी आदर्श हो सकता है।

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