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तटस्थता की मौत

‘दो पक्षपाती नेटवर्क के बीच तटस्थ रेफरी बनने में अब कोई चमक नहीं रही। कोई रेफरी को देखने नहीं जाता।’ सीएनएन के चीफ जेफ्फ जकर के बयान का यह हिंदी तजरुमा किया है। उनकी यह बात पत्रकारिता में तटस्थता की मौत की घोषणा जैसी लगी। द इकोनॉमिस्ट में यह बयान छपा है। बाजार की वास्तविकता ही किसी पेशे की सैद्धांतिकता होने वाली है। रेटिंग गिरने से सारा विश्वास जड़ से हिल जाता है। टीवी का कारोबार इसी रेटिंग पर निर्भर है, जिससे विज्ञापन आता है। कई लोग बिना जानकारी के कह देते हैं कि क्या रेटिंग ही सब कुछ है? दरअसल, टीवी जैसा महंगा माध्यम इसी पर टिका है। जब तक दर्शक दस रुपये प्रति चैनल की जगह 500 रुपये नहीं देंगे, विज्ञापन की निर्भरता समाप्त नहीं होगी। रेटिंग तब भी होगी।

फिर क्या गारंटी कि दर्शक तटस्थ चैनल को छोड़कर पक्षपाती चैनल नहीं देखेंगे? तो क्या जकर की भविष्यवाणी सही होगी? तटस्थता की समाप्ति की घोषणा से झटका लगा है। दुनिया भर से आंकड़े आ रहे हैं कि टीवी के दर्शकों में गिरावट आ रही है। लोग सोशल मीडिया से खबर हासिल कर रहे हैं। कोई भी समाज बिना खबरों के रह नहीं सकता। खबर तो चाहिए, मगर ला कौन रहा है? कम से कम हिंदी टेलीविजन ने यह काम बंद कर दिया है। अंग्रेजी चैनलों के रिपोर्टर भी भटकने की जगह वैसी बाइट ला रहे हैं, जो विवाद पैदा कर सके। इंटरव्यू में टफ सवाल करना कलाबाजी से ज्यादा कुछ भी नहीं। जमीन से लाई गई रिपोर्ट ही आईना होती है। इसलिए एंकर नहीं, रिपोर्टर ढूंढ़िए।
कस्बा में रवीश

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