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गैस और राजनीति

आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की राजनीतिक शैली रोज एक धमाका करने की है। गैस की कीमतों को लेकर केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री वीरप्पा मोइली, पूर्व मंत्री मुरली देवड़ा और रिलायंस उद्योग समूह के प्रमुख मुकेश अंबानी पर एफआईआर दायर करना उनकी इसी राजनीतिक शैली का हिस्सा है। उन्होंने इस संदर्भ में जो-जो बयान दिया है, उसमें काफी सरलीकरण भी है। केजरीवाल, कांग्रेस और केंद्र सरकार के खिलाफ लगातार आक्रामक हो रहे हैं और यह भी माना जा रहा है कि वह इस टकराव के जरिये यह चाहते हैं कि कांग्रेस उनकी सरकार को गिरा दे और वह नए सिरे से सड़कों पर आंदोलन कर सकें। अगर केजरीवाल के आरोपों को राजनीतिक स्टंट मान लिया जाए, तब भी यह मानना होगा कि गैस की कीमत तय करने के मामले में सरकार ने मुसीबत ही मोल ली है। इसमें कोई गलत मंशा न भी रही हो, तो भी गैस की कीमतें तय करने की यह प्रक्रिया कई सवाल खड़े करती है। पहला सवाल यह है कि क्यों सरकार ने जून 2013 में यह तय कर लिया कि अप्रैल 2014 से गैस के दाम क्या होंगे? जिस चीज के दाम बाजार में बदलते रहते हैं, उसके दाम लगभग एक साल पहले तय करने का औचित्य क्या था? यह सवाल तब भी उठाया गया था, जब हम अपनी अर्थव्यवस्था का उदारीकरण कर रहे हैं, तो क्यों गैस के दाम तय करने के लिए रंगराजन कमेटी बिठाई गई, जिसने इतने जटिल फॉर्मूले के आधार पर गैस के दाम तय किए कि विशेषज्ञ उस पर सिर धुनते रहे।

अप्रैल 2014 के एक-दो महीने बाद नई सरकार सत्ता में होगी और संसदीय परंपराएं यह कहती हैं कि जाती हुई सरकारें ऐसे में दूरगामी फैसले नहीं करतीं, उन्हें अगली सरकार पर छोड़ देती हैं। अगर यह फैसला लागू होता है, तो अगली सरकार को चाहे-अनचाहे उसे ढोना पड़ेगा या बदलना पड़ेगा। फिर जब गैस उत्पादन भारत में होना है और खरीदने वाले भी भारत में हैं, तो दाम डॉलर में तय करने का क्या औचित्य है? ध्यान देने की बात यह है कि गैस के दाम उत्पादकों के लिए तय हुए हैं, उपभोक्ताओं के लिए नहीं, यानी गैस उत्पादकों को ये दाम मिलने तय हैं। जाहिर है, इन दामों को लागू करने के बाद गैस से चलने वाले बिजलीघरों की लागत बढ़ जाएगी और उनकी बिजली महंगी हो जाएगी, जिसे खरीदने की कुव्वत राज्य के बिजली बोर्डों या वितरण कंपनियों की नहीं होगी। यह भी खबर आई है कि सरकार गैस से चलने वाले बिजलीघरों को बेल आउट पैकेज दे सकती है। कई क्षेत्रों को सस्ती गैस देना सरकारी मजबूरी होगी, यानी सरकार सब्सिडी का बोझ ढोएगी। अगर गैस की कीमत खुले बाजार में तय होने दी जाती, तो दाम कम होते और निजी क्षेत्र भी उत्साहित होता कि इस क्षेत्र में सरकार का हस्तक्षेप न्यूनतम है। अगर अगली सरकार इस नीति पर सहमत नहीं होती और इसे बदलना चाहेगी, तो इससे अनिश्चितता व अस्थिरता का माहौल बनेगा।

हो सकता है कि सरकार का इरादा भारत में गैस की खोज और उत्पादन को आकर्षक बनाने का रहा हो, या आयात पर निर्भरता घटाने का। लेकिन इस प्रक्रिया में सरकार ने एक और घोटाले का आरोप सिर पर ओढ़ लिया है। अब यह मामला लंबे वक्त तक घिसटेगा और विवादों, मुकदमों के चलते इस क्षेत्र में भी विकास रुक जाएगा। उदारीकरण के इतने वर्षो बाद भी भारत सरकार आखिर इस तरह की जटिल सरकारी कवायद में क्यों यकीन रखती है? पिछले दिनों जितने घोटाले हुए हैं, वे सब सरकारी प्रक्रियाओं को जटिल और अपारदर्शी बनाने से हुए हैं, लेकिन शायद सरकार ने कोई सबक नहीं सीखा है।

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