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हिन्दुस्तान में सैर-सपाटा

अपने सांस्कृतिक आकर्षण, प्राकृतिक विविधता और समृद्ध इतिहास के बावजूद हिन्दुस्तान कई अन्य मुल्कों की तुलना में अपने यहां कम ही सैलानियों को खींच पाता है। इससे यह साफ हो जाता है कि क्यों हिन्दुस्तानी हुकूमत ने वीजा कायदों में छूट पर मुहर लगाई और यह फैसला लिया कि वीजा-ऑन-अराइवल फैसिलिटी 180 मुल्कों के बाशिंदों को मिलेगी, न कि पहले की तरह महज 11 मुल्कों के लोगों को। ऐसा करके यह मुल्क उम्मीद लगाता है कि उसे पर्यटन क्षेत्र में भारी मुनाफा होगा। लेकिन ये कदम इस बात की पूरी गारंटी नहीं देते। बीते साल की ट्रेवल ऐंड टूरिज्म कंपीटीटिवनेस इंडेक्स में इस मुल्क को 140 देशों की सूची में 65वें पायदान पर रखा गया था। जाहिर है, अपनी सीमा के अंदर बेशुमार खूबसूरती समेटने के बावजूद हिन्दुस्तान विदेशी पर्यटकों को ज्यादा खींच नहीं पा रहा है।

यह इंडेक्स सुरक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और टुरिज्म इन्फ्रास्ट्रक्चर जैसे मानकों पर आधारित थी। एक सोच बनती जा रही है कि हिन्दुस्तान सैर-सपाटे के लिए अभी मुफीद मुल्क नहीं है। ऐसी खबरें सच्चाई बयान करती हों या नहीं, पर इससे मलयेशिया, सिंगापुर और दक्षिण कोरिया जैसे मुल्क को तुरंत मुनाफा मिलता है और वे सैर-सपाटे के लिए मनपसंद मुल्क बन जाते हैं। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी होने की वजह से हिन्दुस्तान में प्रदूषण, गरीबी व जुर्म की समस्याएं हैं। एसोसिएटेड चैंबर ऑफ कॉमर्स ऐंड इंडस्ट्री के मुताबिक, 2013 के शुरुआती तीन महीनों में सैलानियों की तादाद में 25 फीसदी की गिरावट दर्ज की गई। इसमें कोई दोराय नहीं कि हिन्दुस्तान को टूरिज्म इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्र में काम करना होगा। कई शहरों में रहने की अच्छी व्यवस्थाएं हैं, पर वहां कीमतें ज्यादा वसूली जाती हैं। सैलानियों को लुभाने के लिए कीमतें घटानी पड़ेंगी। सफर को भी आरामदेह बनाने होंगे। बदतर सड़कों की वजह से सैलानी या तो रेल से सफर करते हैं या विमान से। पर इससे कई जगहें छूट जाती हैं। रोड-रेल नेटवर्क को मजबूती देकर, हॉस्पिटैलिटी सेक्टर में कीमतें घटाकर व कनेक्टिविटी बढ़ाकर पर्यटन क्षेत्र को नई ऊंचाई दी जा सकती है।  
द नेशनल, यूएई

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