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तेलंगाना पर तकरार

हड़बड़ी में लिया गया राजनीतिक  निर्णय अक्सर भारी पड़ जाता है। तमाम अगर-मगर पर विचार के बाद ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहिए था। तेलंगाना से जुड़े विवादों को देखकर यही लगता है। अब स्थिति यह है कि सत्तारूढ़ कांग्रेस पार्टी को अपने ही छह सांसदों के खिलाफ कार्रवाई करनी पड़ी है। आंध्र प्रदेश विधानसभा ने भी इस विधेयक को खारिज कर दिया है। अलग तेलंगाना की मांग पर राज्य की सभी बड़ी पार्टियों ने राजनीतिक रोटियां सेंकी हैं। कांग्रेस, बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टियां भी, तो टीआरएस और टीडीपी जैसी क्षेत्रीय पार्टियां भी। बड़ी पार्टियां अक्सर बंटवारे का विरोध करती हैं और बाद में दबाव में आकर या चुनाव के नजदीक आते ही इसके समर्थन में जोर लगा देती हैं। एक चलन यह भी है कि बंटवारे के फायदे को सत्तारूढ़ पार्टियां भुनाना चाहती हैं और नुकसान विपक्ष के सिर मढ़ देती हैं। अभी तो सभी दलों को लोकसभा चुनाव दिख रहा है। इसलिए तेलंगाना पर सहमति है, पर वहां अंदरखाने में जो विरोध है, वह जल्द शांत होता नहीं दिख रहा है।
युधिष्ठिर लाल कक्कड़, लक्ष्मी गार्डन, गुड़गांव, हरियाणा

व्यवस्था का दुरुपयोग

वित्त मंत्री पी चिदंबरम ने सच ही कहा था कि लोकसभा का आखिरी सत्र भी हंगामे और शोरगुल की भेंट चढ़ जाएगा। पहले ही दिन से इसकी शुरुआत हो गई। अब सवाल उठता है कि क्या वे तमाम विधेयक बीते सत्रों की तरह अधर में लटके रह जाएंगे? इस बार तो कई महत्वपूर्ण विधेयक संसद से पारित होने थे। दरअसल, हमारे जन-प्रतिनिधियों को इस बात की कतई परवाह नहीं है कि इससे देश को कितना नुकसान होगा। उन्हें तो अपनी राजनीति चमकाने से ही फुरसत नहीं, तो देश के बारे में क्या सोचेंगे? अगर ये विधेयक पारित हो जाते, तो देश की कई मौजूदा समस्याएं हल हो जातीं।
जगदीश लाल सलूजा, पीतमपुरा, दिल्ली

शासन या ड्रामा

आम आदमी पार्टी सरकार चला रही है या ड्रामा कर रही है, यह कहना मुश्किल होता जा रहा है। ऐसा लगता है कि केजरीवाल सिर्फ टीवी फुटेज खा रहे हैं। पार्टी के एक विधायक कई हफ्तों बाद अचानक प्रकट होते हैं और कहते हैं कि भाजपा उन्हें खरीद रही थी, पैसे और पद का लोभ दे रही थी। सवाल यह है कि जब टेलीफोन पर उन्हें यह कथित रिश्वत दी जा रही थी, तो उन्होंने फोन टैपिंग क्यों नहीं की? दिल्ली के मुख्यमंत्री तो कह चुके हैं कि रिश्वत देने से मना न करो, बल्कि सेटिंग करके रिश्वत देने वालों को पकड़वाओ। माना कि उस समय वह फोन टैपिंग से चूक गए, तो फिर उसके अगले ही दिन उन्होंने संवाददाता सम्मेलन क्यों नहीं किया? इतना इंतजार किसलिए? बिना किसी प्रमाण के बोलने का क्या मतलब है? दरअसल, यह पार्टी अपने ही वायदों के जाल में उलझती जा रही है। अब वह क्या करे? सरकार चलाना कोई खेल नहीं है, इसके लिए धैर्य और सूझबूझ से काम लेना होता है। यह नहीं कि हम छोड़ देंगे, हम जा रहे हैं, हम इस्तीफा दे देंगे, वगैरह-वगैरह।
कौशल किशोर दुबे, साहिबाबाद, उत्तर प्रदेश

भोजन का असर

आज हमारे देश में अपराध की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। न तो उसे लोकलाज की परवाह है और न ही पुलिस-प्रशासन का भय। आखिर ऐसा क्यों? आयुर्वेद में कहा गया है कि जैसा खाए तन, वैसा होए मन। देखा जाए, तो इन दिनों तामसी भोजन का चलन बढ़ा है। ताजा फल-सब्जियों की जगह डिब्बाबंद खाने और शीतल पेयजल की मांग बढ़ी है। अधिक पैदावार के लिए फल व सब्जियों में कीटनाशकों का उपयोग बढ़ा है, जो किसी न किसी रूप में फल-सब्जियों को दूषित करते हैं। बीते दिनों जीएम फूड के पक्ष में भी माहौल बनाया गया। शायद इन सबसे लोगों की सहनशीलता घटती और आपराधिक प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। हमारे वैज्ञानिकों को इस पर काम करना चाहिए।
श्याम सुंदर  शर्मा ‘साक्षी’, सैनिक विहार, दिल्ली
shyamsakshi39@gmail.com

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