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रंगदारी मांगने व नक्सली हमले से अछूता नहीं है जिला

गोपालगंज। संवाद सूत्र। जिले का पूर्वांचल क्षेत्र। हमेशा नक्सलियों के टारगेट में रहता है। जब भी उनको भनक लगती है कि कोई नया काम जिले में शुरू होने जा रहा है, तो वे आ धमकते हैं। निर्माण कार्य में लगे कंपनियों के अधिकारियों को रंगदारी देने की चेतावनी भी दे डालते हैं।

रंदगारी मांगने का भी उनका एक नया अंदाज होता है। वे निर्माण कंपनी में लगाए गए कैंप या झोपड़ी के दीवारों पर पर्चा चिपका देते हैं कि इतने रुपए की रंगदारी अगर नहीं मिली तो इसका अंजाम भुगतना पड़ेगा। रुपए नहीं देने व इसकी शिकायत पुलिस को करने पर अंजाम भी कंपनी के लोग भुगतते हैं। नक्सली रुए नहीं मिलने के पर कार्य में लगाए गए महंगे-महंगे मशीनो को फूंक डलते हैं। इससे जिले में कोई भी कंपनी अगर काम लेती है तो वह दहशत के माहौल में काम करने को ववशि है।

जिले की पुलिस भी चौकस नहीं दिखती है। पुलिस अगर सक्रिय रहती तो आए दिन इस तरह की घटना जिले में आए बाहर केलोगों को नहीं भुगतना पड़ता। अभी हाल में तो 30 दिसंबर करात नक्सलियों ने जिला मुख्यालय से करीब 80 किलोमीटर दूर सत्तरघाट स्थित वशिष्ठा निर्माण कंपनी के कैंप पर रविवार की रात नक्सलियों ने हमला कर 11 वाहनों को फूंक दिया। आगजनी में करीब 3 करोड़ रुपए की संपत्ति क्षति होने का अनुमान है। करीब सौ की संख्या में आए नक्सलियों ने कंपनी के ढाई सौ मजदूरों को बंधक बनाकर घटना को अंजाम दिया।

करीब एक घंटे तक नक्सलियों ने कैंप में तांडव मचाया। इससे करोड़ो रुपए की क्षति होने का अनुमान लगाया गया था। वहीं 10 फरवरी की रात में बंगरा घाट पुल उद्घाटन का मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को 24 घंटे भी नहीं हुए थे कि नक्सलियों ने हरियाणा के एक निर्माण कंपनी से 25 करोड़ रुपए की रंगदारी की मांग कर ली।

जिले में वर्ष 2008 के बाद आनेवाले वर्षो में नक्सली हमले से जिले की धरती लाल होती रही है। यूं तो नक्सली हमले की शुरूआत वर्ष 2008 में ही हुई थी, लेकिन वर्ष 2012 से नक्सलियों की गोलीबारी से धरती लाल होने लगी।

बीते 6 जून 2012 की बात है। सदर प्रखंड के दियारे में गंडक नदी पर बेतिया से गोपालगंज को जोड़ने के लिए पुल बना रही बशिष्ठा कंपनी के रामपुर टेंगराहीं के पास स्थित कैंप पर अत्याधुनिक हथियारों से लैस अपराधियों ने सुपरवाइजर समेत दो कर्मियों को गोलियों से भूनकर हत्या कर दी गई थी।

आर्मी गुरिल्ला लबिरेशन फ्रंट ने इस हमले की जिम्मेवारी ली थी। उसने दो लोगों की हत्या के बाद घटनास्थल पर पर्चे भी फेंके थे। लेकिन, तत्कालीन एसपी निताशा गुरिया ने इस मामले को पूर्णत: आपराधिक वारदात बताया था।

बहरहाल, पुलिस जो भी कहे पुल निर्माण कंपनी के दो कर्मियों की हत्या से दहशत में आए मजदूर काम छोड़कर घर भाग गए थे। मजदूरों के भाग जाने से पुल निर्माण ठप हो गया था। पूरा इलाका कई माह तक दहशत में जीता रहा।

कंपनी के अधिकारी और कर्मचारी भी सहम गए थे। इस वारदात में लेवी की बात सामने आई थी। चर्चा थी कि अपराधियों ने पुल निर्माण कंपनी से लेवी मांगी थी। लेवी नहीं देने पर अपराधियों ने घटना को अंजाम दिया था।

मालूम हो कि, जिले में नक्सलियों की धमक भले ही वर्ष 2008 में हुई थी, लेकिन सारण प्रमंडल में वर्ष 2007 में इससे एक साल पहले यानी वर्ष 2007 में ही नक्सली वारदात की शुरूआत हो चुकी थी। वर्ष 2007 में 19 जून को छपरा-सोनपुर रेलखंड पर नक्सलियों ने बाघ एक्सप्रेस की एस्कार्ट पार्टी के दो जवानों की हत्या कर एसएलआर और तीन राइफलें लूट ली थीं।

इस घटना के ठीक दो माह बाद 19 अगस्त को सारण के मकेर थाना क्षेत्र के तत्कालीन प्रमुख गुड्ड शर्मा के घर पर हमला कर उनके परिवार के तीन लोगों की नक्सलियों ने हत्या कर दी और उनके दरवाजे पर खड़े ट्रैक्टर व अन्य वाहनों को जला दिया।

बहरहाल , जिले के पूर्वांचल के कतालपुर मीरा टोला की घटना में प्रत्यक्ष तौर पर पीपुल्स गोरिल्ला पार्टी के प्रवक्ता ने नक्सली हमले की जिम्मेवारी ली है। इससे इसी हमले को जिले में पहला नक्सली हमला माना जा रहा था।

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