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पाकिस्तानी तालिबान का खेल

बारह साल पहले, जब अमेरिका और नाटो की फौजें अफगानिस्तान में दाखिल हुई थीं, तब उसके कुछ ही हफ्ते बाद मैंने एक लेख में लिखा था कि इसे लेकर जो उत्साह दिखाया जा रहा है, वह गलत दिशा में जा रहा है। एक तो यह लड़ाई लंबी चलेगी और दूसरे, इसका एक असर यह होगा कि पाकिस्तान अस्थिर हो जाएगा। बदकिस्मती से बाद में जो घटनाक्रम हुआ, उसने मेरे इस विश्लेषण को गलत साबित नहीं होने दिया। इस लड़ाई का असर पाकिस्तान में पिछले कुछ बरस से तबाही मचा रहा है। यह कहना कि पाकिस्तान में जो हो रहा है, उसका अफगानिस्तान से कोई ताल्लुक नहीं, बहुत ही सतही सोच है। इसलिए इस पूरे मामले पर काफी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है।
यह बात किसी से छिपी नहीं है कि अमेरिका में 11 सितंबर के आतंकवादी हमले के बाद से पाकिस्तान की सभी सरकारों ने, चाहे वह परवेज मुशर्रफकी सरकार हो, आसिफ अली जरदारी की सरकार हो या फिर शरीफ बंधुओं की, न सिर्फ अमेरिका को पाकिस्तान में ड्रोन हमले करने के इजाजत दी, बल्कि सीआईए को पाकिस्तान में अपने अभियान भी चलाने दिए। लेकिन जनमत सर्वेक्षण बताते हैं कि पाकिस्तानी अवाम का बहुमत अमेरिकी नीतियों का विरोध करता रहा है। पाकिस्तान की उदार धर्मनिरपेक्ष पार्टियों के अमेरिका की तरफ झुकाव का फायदा धार्मिक कट्टरपंथियों के हथियारबंद गुटों को मिला है और अब वे हिंसा को इस्तेमाल करने के सरकार के एकाधिकार को चुनौती देने लगे हैं। वे खुद को पाकिस्तान में इस्लाम और पूरे घटनाक्रम का शिकार बने पख्तून समुदाय का सबसे बड़ा संरक्षण बताने लगे हैं। हालांकि, उनके ये दोनों ही दावे झूठे हैं।

सिर्फ पिछले एक साल में पाकिस्तान के सबसे बड़े कट्टरपंथी तालिबानी संगठन तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने मुल्क के कई हिस्सों में सैकड़ों हमले किए। हजारों बेगुनाह लोगों को मार डाला, जिनमें आधे लोग सुरक्षा बलों और फौज के थे। मरने वाले कौन थे? पेशावर के ईसाई, मुल्क के विभिन्न हिस्सों में रहने वाले शिया, कराची के नौसैनिक, खुफियागिरी के काम में लगे लोग, पुलिस वाले और फौजी। पिछले कुछ साल में सेना ने उन्हें कई इलाकों से हटाने की बहुत कोशिश की, लेकिन उसे नाकामी ही हाथ लगी। इसका सबसे बड़ा उदाहरण है स्वात क्षेत्र। इस नाकामी के दो बड़े कारण थे, एक तो फौज के लोग बेपरवाह और ढीले-ढाले हैं। जिस काम के लिए उनकी तैनाती होती है, नतीजा उसका एकदम उल्टा होता है और उसके बाद उन्हें वापस बुला लिया जाता है। और दूसरा कारण यह है कि जब फौज बैरक में वापस चली जाती है, तो नागरिक इन्फ्रास्ट्रक्चर इतना कमजोर है कि वह अपने बूते हथियारबंद आतंकवादियों के हमलों से निपट ही नहीं सकता। यह तरीका पाकिस्तान में बार-बार दोहराया जाता है और कभी कुछ नहीं बदलता।

कुछ हफ्ते पहले, तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान ने रावलपिंडी में सेना के मुख्यालय पर हमला बोला, हमले में कई फौजी और नागरिक मारे गए। प्रधानमंत्री नवाज शरीफ जब घायलों को देखने स्थानीय अस्पताल पहुंचे, तो वहां नाराज नागरिकों की भीड़ जमा थी, जो तहरीक-ए-तालिबान के खिलाफ नारे लगा रही थी और कार्रवाई की मांग कर रही थी। लोगों के इस बर्ताव से नवाज शरीफ इतना हिल गए कि उन्होंने अपने एक नजदीकी मंत्री को तहरीक के खिलाफ जंग छेड़ देने का जिम्मा सौंप दिया। तुरंत ही पाकिस्तान की वायुसेना के विमानों को तहरीक के मुख्यालय पर हल्ला बोलने के लिए भेज दिया गया। तहरीक के नेताओं को अचानक हमले की उम्मीद नहीं थी, इसलिए उन्होंने फौरन ही सरकार से वार्ता करने का सुझाव दे डाला। उन्होंने पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ पार्टी के नेता और पूर्व क्रिकेटर इमरान खान को यह प्रस्ताव भेजा कि वार्ता में उनके प्रतिनिधिमंडल शामिल हों। उनकी पार्टी इस समय पख्तूनख्वा प्रांत की सरकार चला रही है। इस बात से इमरान परेशान हो उठे और उन्होंने प्रस्ताव को ठुकरा दिया। लेकिन उनकी जगह कुछ और तैयार हो गए। इनमें शमी उल हक भी हैं, इन अजीबोगरीब मौलाना को ‘तालिबान का पिता’ भी कहा जाता है। वार्ता का प्रस्ताव सामने आया, तो नवाज शरीफ ने सेना का ऑपरेशन रोक दिया। तमाम बाधाओं के बाद अब मामला वार्ता की ओर बढ़ता दिख रहा है। लेकिन इससे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है, इससे तो बस एक अस्थायी शांति होगी।

ये बमबारी, ये हिंसा की घटनाएं चाहे जितनी भी खौफनाक क्यों न हों, पर इस पूरी समस्या की जड़ अफगानिस्तान में ही है। ऐसा नहीं है कि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान का पूरा ढांचा, इसके सारे नेता इतने ताकतवर हैं कि उन्हें दबोचा नहीं जा सकता, उन पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकता या उन्हें सजा नहीं दी जा सकती। सच तो यह है कि अब जब अफगानिस्तान से अमेरिकी फौज की वापसी का समय सामने है, तब पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई और पाकिस्तान में बैठे इस एजेंसी के हुक्मरान तहरीक-ए-तालिबान को आहत करने का खतरा मोल नहीं ले सकते। इस्लामाबाद ने एक नया सिद्धांत गढ़ा है, जिसे ‘स्ट्रैटजिक डेप्थ’ या सामरिक गहराई का नाम दिया गया है। यह सिद्धांत कहता है कि भारत के खिलाफ सबसे अच्छी रक्षा नीति यह है कि अफगानिस्तान को भारत और सहयोगियों से दूर रखा जाए। वैसे यह अजीबोगरीब-सा सिद्धांत है,  क्योंकि भारत और पाकिस्तान, दोनों ही परमाणु शक्ति से संपन्न ताकते हैं और दोनों के बीच कोई भी गंभीर टकराव दोनों देशों में तबाही ला सकता है।

अफगानिस्तान में रहने वाले पख्तून ब्रिटिश सरकार के उस विभाजन से हमेशा खफा रहे हैं, जिसने पख्तूनों को दो हिस्सों में बांट दिया। इसी तरह पाकिस्तान में रहने वाले इस्लामाबाद की बजाय खुद को अफगानिस्तान के ज्यादा नजदीक मानते हैं। तालिबान इस पूरे मामले को मजहबी जामा पहनाकर इस विभाजन को ढकना चाहते हैं, लेकिन इस जामे के नीचे भी राष्ट्रीयता का सवाल अपनी जगह मजबूत है। अगर आईएसआई का एक तबका इन हथियारबंद तालिबान की मदद करता है, तो इसी आईएसआई के दूसरे तबके के लिए इसे बंद करना बहुत मुश्किल है। हामिद करजई, जिन्हें बहुत से तालिबान नेता कठपुतली राष्ट्रपति कहते हैं, इस चीज को बहुत अच्छी तरह से समझते हैं, इसलिए उन्होंने पिछले दिनों यह कहा कि तालिबान हमारे ही भाई हैं। ऐसा कहकर दरअसल वह उस ब्रिटिश विभाजन को ही नकार रहे थे। शायद वह इस्लामाबाद को कमजोर करने के लिए पख्तून राष्ट्रीयता को बढ़ावा देना चाहते हैं। हर तरफ बहुत बड़े-बड़े दांव लगे हुए हैं।
द गाजिर्यन  से साभार
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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