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लोक कलाकारों के प्रति कितने संजीदा हैं हम

हमारे देश की एक अमूल्य निधि हमारी लोक कलाएं हैं, जो विभिन्न विधाओं के रूप में लाखों गांवों और बस्तियों में बिखरी हुई हैं। इनमें से अनेक लोक कलाएं आज संकट में हैं और इन्हें जीवित रखने वाले परंपरागत कलाकार बेहद अभावग्रस्त जीवन जी रहे हैं। कई कारणों से अब एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी पैतृक कलाएं भी नहीं सीख पा रही है। इस स्थिति में सरकार और स्वैच्छिक संगठन, दोनों की बड़ी जिम्मेदारी है कि वे लोक कलाओं की रक्षा और लोक कलाकारों की सहायता के लिए हर संभव प्रयास करें। हमारे अनेक लोक कलाकार दलित और निर्धन परिवारों से हैं। अशिक्षित होने के बावजूद उनके पास बहुत समृद्ध लोक कलाएं हैं। अक्षर ज्ञान हो या न हो, पर ये लोक कलाकार घंटों तक गा सकते हैं। कुछ आदिवासी क्षेत्र तो लोक नृत्य और चित्रकला, दोनों से बहुत समृद्ध हैं। कई लोक नृत्यों की  विशेषता उनका सामूहिक चरित्र है। अत: पूरे समूह की रचनात्मकता को प्रोत्साहित करने की आवश्यकता है।
शहरी क्षेत्रों में भी लोक कलाकारों की कई बस्तियां बसी हैं। दिल्ली में कठपुतली नगर का विशेष महत्व है, क्योंकि इसमें विविध तरह के कलाकार एक ही बस्ती में रहते हैं। ऐसी बस्तियों की विशिष्ट पहचान को बनाए रखते हुए इनके विकास कार्य होने चाहिए, ताकि लोक कलाकारों की रचनात्मकता को उभरने का अवसर मिले तथा नई पीढ़ी भी इसे लेकर प्रोत्साहित हो। हमारे देश में कई संगठन ऐसे हैं, जो अपने स्तर पर काफी पहले से लोक कलाकारों और कलाओं की रक्षा के लिए सक्रिय हैं। इन संगठनों की सहायता से सरकार को यह कार्य आगे बढ़ाना चाहिए। मगर सरकारी अनुदान हजम करने की जुगाड़ में लगी स्वार्थी संस्थाओं को पहचानना भी जरूरी है।

पर्यटन और संस्कृति विभाग के विभिन्न कार्यक्रमों के तहत अनेक लोक कलाकार विदेश यात्रा कर आए हैं और चंद पलों के लिए उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मंचों पर वाहवाही भी प्राप्त की। लेकिन इससे समुदायिक स्तर पर उनकी कला को कोई स्थायी लाभ नहीं मिला। ऐसे में, असंतोष भी उत्पन्न होता है, क्योंकि किसी एक कलाकार को दो-तीन दिनों की विदेश यात्रा के एक लाख रुपये मिल जाएं और अन्य कलाकारों की कोई पूछ न हो। इसलिए जरूरत ऐसे प्रयास की है, जो अपने प्रभाव में टिकाऊ  और व्यापक हों। लोक कलाकारों के अनेक वाद्य अब दुर्लभ होते जा रहे हैं। इन वाद्यों की रक्षा के बिना लोक कला नहीं  बच पाएगी। हमें परंपरा से हटकर भी लोक कलाओं को नए संदर्भ में खोजना चाहिए। जिस तरह कठपुतली कला का सुंदर उपयोग राजस्थान के कलाकारों व कार्यकर्ताओं ने सूचना के अधिकार व रोजगार की गारंटी के प्रचार-प्रसार के लिए किया है, वह आधुनिक संदर्भ में लोक कलाओं की नई उपयोगिता का शानदार उदाहरण है। इन मुद्दों पर हुई अनेक जनसभाओं में सबसे अधिक तालियां तभी बजीं, जब ग्लोव कठपुतलियों के जरिये बातें समझाई गईं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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