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सब कुछ नाम में ही रखा है

विलियम शेक्सपियर साहब का रोमियो-जूलियट भले अंग्रेजी से परहेज करने वालों ने न पढ़ा हो, पर उस कृति का यह चर्चित वाक्य ‘व्हाट इज इन नेम’ यानी नाम में क्या रखा है, गाहे-बगाहे जरूर पढ़ा होगा। इस आप्त वचन की ठसक जहां ‘नाम’ सड़क पर पसरी हो, हवाई अड्डों और शिक्षण-संस्थानों की पहचान हो, उस अनूदित भारत, बोले तो इंडिया में मायने नहीं रखती। देश के संविधान में अलिखित, लेकिन दृढ़ता से पालन किया जाने वाला कानून तो यही है कि जब भी किसी नई योजना का ‘नाम’ करण जरूरी हो, एक खास परिवार की ओर गरदन उठाकर देखो, जैसे पपीहा बादल की ओर देखता है। नाम पर सिर्फ योजनाएं नहीं, टी स्टाल भी मिलेंगे। आगामी चुनावी जंग के लिए नाम-धारी लोगों ने ही मोर्चा संभाल रखा है। वोट उन्हीं नाम-चीनों पर गिरने या ‘लुढ़कने’ हैं। सिने-जगत के इतिहास पर प्रकाश डालने से और स्पष्ट हो जाता है कि नासपीटे नाम के चलते ही अमेरिकी हवाई अड्डे पर फजीहत उठानी पड़ी थी एक चर्चित अभिनेता को। सारी महिमा नाम में। उन्हीं साहब की फिल्म का नाम ‘माई नेम इज तिवारी’ अथवा ‘माई नेम इज नकवी’ होता, तो क्या वह इतना धन बटोर पाती? ऐश्वर्या राय का आदरपूर्वक नाम न लेने पर सास भड़क चुकी हैं, कोई भकुआ उन्हें कुछ और कहकर तो देखे, ससुरजी ऐसी की तैसी कर देंगे ब्लॉग में।

सारा तमाशा नाम का। नाम से महकता है वातावरण। गुलाब का ‘लाब’ खिसका भर दें, रूमाल नाक पर बैठ जाएगा। नाम से ही भीड़ जुटती है। नाम से ही आइडेंटिटी बनती है। नाम का वजूद होता है। नाम का संस्कार होता है। भक्त जन कहते भी हैं- राम से बड़ा राम का नाम। उसे पूजा जाता है। वंदना होती है उसकी। यह सर्वथा अलग चिंतन है कि उनके नाम का ‘सत्य’ जीवन की अंतिम यात्रा में ही उद्घाटित होता है।  इस भारत भूमि पर नाम का भी सिक्का चलता है। शेक्सपियर साहब को अंदाजा न था कि हिन्दुस्तान में ‘नेम’ दरकिनार कर सरनेम से सत्ता चलाएंगी पार्टियां। इतना ही नहीं, बाबा के नाम से पोते तक ऐश करेंगे, चाहे वे बच्चन हों या फिर रोशन। नाम में सब रखा है। नाम की जय हो।

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