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स्थायी सफलता की नींव

अक्सर सफल लोग चाहते हैं कि सफलता युगों-युगों तक उनके परिवार में बनी रहे। लेकिन ऐसा होता नहीं है। चक्रवर्ती सम्राट चंद्रगुप्त मौर्य की अपार सफलता का स्थायित्व दूसरी पीढ़ी तक आते-आते बिखर गया। ऐसा ही मशहूर शहनाई वादक बिस्मिल्लाह खान, प्रसिद्ध अभिनेता देव आनंद की नई पीढ़ी के साथ हुआ। मनोवैज्ञानिक कहते हैं कि ऐसा शायद इसलिए है कि सफलता का विराट रूप ही उसके स्थायित्व के लिए नकारात्मक बन जाता है। मगर ऐसा हमेशा नहीं होता। प्रेरक गुरु और साइकोलॉजी ऑफ विनिंग के लेखक डेनिस वेटली कहते हैं कि ‘सोच और प्रयासों का सामंजस्य ही किसी सफल व्यक्ति को आगे भी सफल बने रहने की गारंटी देता है।’

सफलता का पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थायित्व परिवेश और परवरिश पर निर्भर करता है। सफल व्यक्ति के बच्चे तभी सफल बन सकते हैं, जबकि परिवार में सफलता को योग्यता और समझदारी से प्राप्त हुआ समझा जाए। अक्सर एक और दो-पीढ़ी तक सफलता पाने के लिए संघर्ष होता रहता है। तीसरी पीढ़ी उसे अपनी बपौती मानकर बैठ जाती है और यहीं से उसकी विफलता की कहानी शुरू हो जाती है। सफल व्यक्तियों की संतानें स्वयं को सर्वश्रेष्ठ समझते हुए हर स्थान पर मनमानी करती हैं। ‘वर्क  लाइफ बैलेंस डॉट कॉम’ साइट के एक ताजा सर्वेक्षण में यह बात समाने आई है कि सफलता को केवल वही 40 प्रतिशत लोग आगे बढ़ा पाते हैं, जिनका चरित्र बेदाग होता है। हालांकि दागदार लोग भी सफल होते हैं, लेकिन एक दौर के बाद उनकी सफलता की चमक खो जाती है। सफलता स्थायी तभी रह सकती है, जब परिवारों में एकजुटता और समर्पण का भाव हो। इसके लिए बच्चों में बचपन से ही संयमित जीवनशैली और परिवार के साथ चलने की आदत डालनी चाहिए। संयमित जीवन शैली ही सफलता को पीढ़ी-दर-पीढ़ी स्थायी बना सकती है।

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