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भीड़ में अकेले

यहां मुंबई में कई बार आप उस पत्ते की तरह महसूस करने लगते हैं, जो नदी के प्रवाह के बीच किसी पत्थर से अटक गया हो। आसपास सब कुछ लगातार बह रहा हो, पर आपके मन का कोई सिरा उस पथरीली सतह पर कहीं दबा रह गया हो। बहता हुआ पानी लगातार आपको धकेलता हो, पर आप आगे बढ़ ही नहीं पा रहे हों। चोटिल होते जा रहे हों। अदृश्य-सी चोटें, जो दिखती नहीं, शायद होती भी नहीं, पर सालती हैं। नदी जो समय है, बहाव जो वर्तमान है और इस तरह की मन:स्थिति उस बहाव में मन की अटकन है, जो परेशान करती है कभी-कभी। ट्रेन पर चढ़ने वालों की भीड़ में रुककर कभी उन सैकड़ों जंग खाए हुए से चेहरों की ओर नजर जाती है, तो लगता है कि जैसे वक्त की रगड़ खाकर घिस-से गए बर्तनों को देख रहा हूं। बर्तन, जिनमें जिंदगी बस इसलिए रख दी गई है, क्योंकि उनमें खाली जगह थी।

अंधेरी स्टेशन के ओवरब्रिज पर एक कोने में खड़े होकर लोगों को उस डिस्प्ले बोर्ड के नजरिये से देखने का मन होता है, जो अपनी जगह पर रुके-रुके लोगों को अलग-अलग प्लेटफॉर्मो की तरफ भागने का इशारा कर रहा है। लोग किसी उन्माद में भागते-से नजर आते हैं। ठहरकर देखो, तो इन लोगों पर हंसी छूटती है, पर अगले ही पल एहसास होता है कि इन उन्मादी पागलों में एक मैं भी हूं। इस भागने के बीच रुकना जो आत्मबोध कराता है, वह रोंगटे खड़े कर देता है। मैं कुछ देर रुककर खुद को भागने के बावजूद कहीं भी न पहुंचते हुए देखता जाता हूं।
मोहल्ला लाइव में उमेश पंत   

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