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क्रिकेट की कालिख

सुप्रीम कोर्ट ने इंडियन प्रीमियर लीग (आईपीएल) के स्पॉट फिक्सिंग मामले में पूर्व हाईकोर्ट जज मुकुल मुद्गल की अध्यक्षता में जो तीन सदस्यीय कमेटी बनाई थी, उसकी रिपोर्ट भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआई) के सामने अब तरह-तरह के धर्मसंकट खड़े कर देगी। इस रिपोर्ट में बीसीसीआई अध्यक्ष एन श्रीनिवासन के दामाद और चेन्नई सुपर किंग्स के पूर्व टीम प्रिंसिपल गुरुनाथ मैयप्पन को आईपीएल में सट्टेबाजी का दोषी पाया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक, मैयप्पन के स्पॉट फिक्सिंग में शामिल होने के संदेह के लिए और ज्यादा जांच की जरूरत है। मैयप्पन का इस पूरे कांड में पहली बार नाम आ जाने के बाद ही एन श्रीनिवासन को बीसीसीआई से हट जाना चाहिए और अगर वह नहीं हटते, तो बीसीसीआई को उन्हें निकाल देना था। पर हुआ यह है कि इस कांड के बाद श्रीनिवासन फिर से बीसीसीआई के अध्यक्ष चुने गए और अब तो वह इंटरनेशनल क्रिकेट काउंसिल (आईसीसी) के भी अध्यक्ष का पद संभालने वाले हैं। इस रिपोर्ट के बाद भी यह संभावना कम ही है कि श्रीनिवासन खुद चले जाएं, न ही यह संभावना है कि बीसीसीआई की नैतिकता इससे जाग जाए।

श्रीनिवासन और उनके साथी इस तरह से व्यवहार करते रहे हैं, जैसे बीसीसीआई उनकी घरेलू कंपनी हो, हालांकि देश के कानून और सभ्य समाज के कायदे किसी निजी संस्थान के लिए भी अलग नहीं होते। श्रीनिवासन का फिर से बीसीसीआई अध्यक्ष चुना जाना और अब आईसीसी के अध्यक्ष पद पर कब्जा करना यह बताता है कि उन्होंने बीसीसीआई की अकूत दौलत का फायदा किस तरह उठाया है। लेकिन बीसीसीआई की यह दौलत उनकी निजी मिल्कियत नहीं है, बल्कि वह देश-विदेश के करोड़ों क्रिकेटप्रेमियों से हासिल की गई है, इसलिए वह सार्वजनिक संपत्ति है। श्रीनिवासन के राज में तमाम क्रिकेट पदाधिकारियों से लेकर वर्तमान और पूर्व खिलाड़ियों को इतना पैसा बांटा गया है कि कोई उनके खिलाफ नहीं जाता। अगर आईपीएल में सट्टेबाजी और स्पॉट फिक्सिंग का खेल चल रहा था, तो वह इसी पैसे की संस्कृति की वजह से था। चूंकि बीसीसीआई में किसी नियम-कानून का राज नहीं था, इसलिए स्वाभाविक ही था कि वहां दूसरे किस्म के भी गैर-कानूनी कारोबार पनपते। श्रीनिवासन बीसीसीआई के अध्यक्ष होते हुए भी चेन्नई सुपर किंग्स के मालिक बन गए, कृष्णामचारी श्रीकांत भारतीय टीम के मुख्य चयनकर्ता होते हुए चेन्नई सुपर किंग्स के ब्रांड एंबेसडर बन गए, जिसके कप्तान महेंद्र सिंह धौनी भारतीय टीम के भी कप्तान हैं।

भारतीय क्रिकेट टीम के मैचों को दिखाने का ठेका जिन टीवी चैनलों को दिया गया, उन पर यह शर्त थोपी गई कि उनके कमेंटेटर टीम के चयन और बीसीसीआई की नीतियों की आलोचना नहीं कर सकते। जब इस तरह का माहौल हो, तो मैयप्पन जैसे लोग भी निरंकुश हो ही जाएंगे, इसमें आश्चर्य क्या है? बीसीसीआई में जो सचमुच क्रिकेटप्रेमी हैं, अगर उन्होंने अब भी हिम्मत नहीं दिखाई, तो इस तरह के कांड भविष्य में भी हो सकते हैं और इसका खामियाजा क्रिकेट को उठाना पड़ सकता है। स्पॉट फिक्सिंग के घोटाले की  तह तक जांच नहीं हुई है। दिल्ली पुलिस के पूर्व कमिश्नर नीरज कुमार ने कहा था कि जांच को दबाव की वजह से बीच में ही रोक दिया गया था। इस समूचे कांड की जांच अगर अदालत की निगरानी में होती है, तभी पूरे तथ्य सामने आ पाएंगे, वरना क्रिकेट से इतने लोगों के निहित स्वार्थ जुड़े हैं कि सफाई की हर कोशिश कुछ दूर जाकर रुक जाती है। मुद्गल कमेटी ने जो काम शुरू किया है, उसे अधूरा नहीं छोड़ा जाना चाहिए।

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