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हड़ताल और हड़कंप

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता हर प्राणी का अधिकार है। जहां अन्य जीव अपनी नाराजगी या क्रोध दिखाने में हिंसक हो उठते हैं, वहीं मनुष्य अपनी जिद पर बैठ जाता है। जिद पूरी करवाने के लिए नाराज होकर घर के एक कोने में बैठने की प्रवृत्ति पुरानी है। प्राचीन काल में राजमहल के एक कोने में कोपभवन हुआ करता था, जहां रानियां अपनी नाराजगी प्रकट करती थीं। रामायण में भी कैकेयी के कोपभवन में जाने का उल्लेख है। युग के साथ तौर-तरीके बदलते हैं। आज समाज में व्यक्ति-विशेष नहीं, बल्कि समूह का योगदान उपेक्षित है। जहां व्यक्ति विशेष की जगह समूह की बात होगी, वहां कोपभवन की जगह चौक-चौराहे की बात होगी, नाराजगी की जगह ‘हड़ताल’ या धरने की बात होगी। चार अक्षर का यह शब्द आज जब देखो, तब हड़कंप मचा देता है। आए दिन इसका इस्तेमाल आम बात हो गई है। अपनी जिद मनवाने के लिए यह शब्द हथियार बन चुका है।
शालिनी खन्ना, झरिया              
shalinikhannashalini@gmail.com


तेलंगाना पर नसीहत

संसद के मौजूदा सत्र में जिन बिलों के कारण गतिरोध उत्पन्न हुआ, उनमें तेलंगाना बिल भी शामिल है। दरअसल, केंद्र सरकार इसी सत्र में तेलंगाना बिल पास कराना चाहती है, ताकि अलग राज्य बन सके। लेकिन इस पर सभी नेता एकमत नहीं हैं, यहां तक कि आंध्र प्रदेश के सांसद भी। वास्तव में, तेलंगाना आंदोलन शुरू से ही विवादों के घेरे में रहा है। इससे यह सीख मिलती है कि बहुत सोच-विचार के बाद सर्वसम्मति से नया राज्य बनाया जाना चाहिए। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने नए राज्य-निर्माण से पहले हर पहलू पर विचार नहीं किया, अन्यथा आंध्र में जो प्रदर्शन हुए, वे नहीं होते। कुछ साल पहले जब तीन राज्य बने थे, तब बड़ी आबादी ने खुशियां मनाई थी। लेकिन तेलंगाना के मामले में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। जब नए राज्य का निर्माण हो, तभी राज्य की राजधानी का मसला हल किया जाना चाहिए, वरना बाद में यह भी एक जटिल समस्या बन जाएगी।
नवीनचंद्र तिवारी, सेक्टर 14, रोहिणी
tewari.navinchandra@gmail.com

आरक्षण का प्रावधान

संविधान ने समाज के कमजोर तबकों की जातियों को समानता से जीवन जीने का अवसर देने के लिए ही आरक्षण का प्रावधान किया है। बीते लगभग 10 वर्षों में यूपीए सरकार ने ऐसे ठोस प्रयास नहीं किए कि आरक्षण के वर्षों पुराने प्रावधान को खत्म किया जा सके। जब तक केंद्र सरकार पिछड़ी जातियों को समान मुकाबले के लायक नहीं बनाती है, तब तक उसे आरक्षण जारी रखना पड़ेगा। पिछड़ी जातियां भी अगड़ी जातियों की भांति सुविधा संपन्न होना चाहती हैं। फिर इसमें विरोध क्यों हो रहा है? सामाजिक क्रांति के जनक महात्मा ज्योतिबा फुले ने तो जाति-व्यवस्था को ही समाप्त करने का अभियान चलाया था। कांग्रेस के महामंत्री ही नहीं, अगड़ी जाति के अनेक लोग यह चाहते हैं कि पिछड़ी जातियों को मिल रहे आरक्षण के प्रावधान को समाप्त कर आर्थिक आधार पर आरक्षण निर्धारित हो। इसमें किसको ऐतराज है? पर पहले पिछड़ी जातियों के लोगों को सामाजिक रूप से समान स्तर पर सक्षम बनाने का काम पूरा तो हो। फिर कौन आरक्षण मांगेगा? अपने आप आरक्षण समाप्त हो जाएगा।
सैनी रामनारायण चौहान, गाजीपुर, दिल्ली

हारती हुई टीम

अक्सर निर्णायक क्षणों में खिलाड़ी का मनोबल पहले टूटता है और फिर हार की कहानी यहीं से तैयार होती है। न्यूजीलैंड के खिलाफ पहले टेस्ट की दूसरी पारी में भारतीय बल्लेबाजों के साथ यही दिखा। कई बार ऐसा लगा कि खिलाड़ी हारी हुई बाजी लड़ रहे हैं, जबकि जीत की राह बेहद आसान नहीं, तो मुश्किल भी नहीं थी। लेकिन हमारे बल्लेबाज विकेट लुटाते गए। जब महेंद्र सिंह धौनी पुछल्ले बल्लेबाजों के साथ थोड़े संघर्ष की स्थिति में आए, तब उनसे भी वही गलती हुई। धैर्य से काम लेने की जगह अधीर बनकर वनडे मैचों के शॉट खेलने लगे।
मनोज रंजन, भजनपुरा, दिल्ली

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