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मन को प्रबल बनाने का पर्व

माघ पूर्णिमा के दिन स्नान, दान, यज्ञ, हवन करने से चौतरफा तरक्की मिलती है। इस रहस्य को समझने के लिए हमें मन की अपार शक्ति को जानना होगा। चन्द्रमा हमारे मन की प्रेरक शक्ति है। मन चंचल होता है। माघ पूर्णिमा को उपासना करने से मन की चंचलता शांत होती है। माघ पूर्णिमा का महत्व बता रहे हैं नरेश मिश्र

विविध पंथों, सम्प्रदायों, पद्धतियों से युक्त हिन्दू धर्म, संस्कृति की एक समान पहचान ऐसी है, जिसने हिन्दुओं को एकता के धागे में पिरो रखा है। सभी हिन्दू सम्प्रदाय पर्व-त्योहारों पर पवित्र नदियों, नदी-संगम, सरोवर, कुंड या समुद्र में स्नान करते हैं। जल मनुष्य के जीवन का आधार है, तीर्थ स्नान हिन्दुओं की अपनी खास पहचान है। पवित्र स्नान के लिए विशेष रूप से बैशाख, कार्तिक और माघ मास रेखांकित किए गए हैं। माघ स्नान का वरदान पर्व माघी पूर्णिमा पर तीर्थ स्थानों में स्नान-दान, पूजन, हवन वगैरह करने से विशेष पुण्य मिलता है। प्रयाग यज्ञ भूमि है, इसलिए यहां माघ स्नान को विशेष महत्व दिया गया है। माघी पूर्णिमा पवित्र स्नान का पूर्णाहूति पर्व है।
शास्त्रों में माघी पूर्णिमा के धार्मिक कृत्य बताए गए हैं। सवेरे नित्यकर्म के बाद पवित्र जल स्रोतों में स्नान करना चाहिए। तीर्थराज प्रयाग के त्रिवेणी संगम पर स्नान, पूजन, दान, हवन, पितर श्राद्ध करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। इस पर्व पर प्रयाग में कल्पवास करने वाले एक महीने की अवधि पूरी कर हवन, दान का संकल्प पूरा कर अपने घर वापस लौटते हैं। गृहस्थ और साधु-संत स्नान के बाद मां गंगा का पूजन कर अपने कुटी आवास में हवन, दान, साधु-संन्यासी, ब्राह्मण और भिक्षुकों को भोजन कराकर कल्पवास के लिए रखी गई खाने-पीने की बची हुई चीजें दान कर देते हैं। वे अपने साथ गंगा की रेणुका, रोली, रक्षा और प्रसाद लेकर घर वापस लौट जाते हैं।

माघ पूर्णिमा के पर्व पर तिल, कपास, सफेद वस्त्र, गुड़, घी, मोदक पदत्रण फल, अन्न, सोना-चांदी का यथाशक्ति दान करना चाहिए। दान के बाद रात में जाग कर कथा-कीर्तन में समय बिताना चाहिए। इस पर्व पर व्रत रखने वाले अगले दिन ब्राह्मण को भोजन करा कर पारण करते हैं। माघी पूर्णिमा महाविष्णु, भगवान कृष्ण की आराधना के लिए विशेष रूप से धर्मशास्त्रों में रेखांकित की गई है। प्रयाग के अधिष्ठाता देवता माधव महाविष्णु कृष्ण के रूप हैं। वे देवनदी गंगा और यमुना के पवित्र संगम में सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके सुंदर स्वरूप का वर्णन वेद-पुराणों, शास्त्रों और कालजयी कृतियों में किया गया है। शरीर रचना विज्ञान (एनाटमी) के एक वैज्ञानिक ने अपनी पुस्तक के मंगलाचरण में लिखा है-
‘कालिंदी जलनीलिम्नो, नीलम ज्योति उपासमहे।
यद् मास दनुभासन्ते, ज्योतींषिच जगन्तिच।।
इस सुन्दर दार्शनिक श्लोक में यमुना के सुन्दर नीले रंग की ओर संकेत कर भगवान विष्णु की नीली ज्योति को नमन किया गया है। इसी नीली ज्योति के प्रकाश से सारे नक्षत्र, ग्रह और ब्रह्मांड को प्रकाश मिलता है।
‘नील सरोरूह श्याम, नीलांबुजम, श्यामल कोमलांगम’ कह कर गोस्वामी तुलसीदास ने महाविष्णु का नमन किया है। भगवान कृष्ण का एक नाम माधव है। ऋतुराज वसंत का पर्यायवाची माधव है। गीता में भगवान कृष्ण ने कहा है- मैं ऋतुओं में वसंत हूं। माघी पूर्णिमा के दूसरे दिन फागुन परीवा को वसंत ऋतु शुरू होती है। माघ पूर्णिमा तप की पूर्णता की प्रतीक है। तप धर्म का रूप है। धर्म के बाद जिन तीन पुरुषार्थों की व्याख्या की गई है, उनमें अर्थ, काम और मोक्ष हैं। महर्षि व्यास ने लिखा है- मैं दोनों बाहु उठा कर कहता हूं, पर मेरी बात कोई नहीं सुनता। धर्म से ही धर्म और काम मिलते हैं तो लोग धर्म का पालन क्यों नहीं करते। महर्षि व्यास का यह प्रश्न सनातन है, अनन्त काल से इसका जवाब तलाश किया जा रहा है। समाज के जो लोग इस सवाल का जवाब तलाश लेते हैं, वे अमर हो जाते हैं। महापुरुष की श्रेणी में जगह पा जाते हैं। माघ पूर्णिमा का भौतिक-सांसारिक महत्व भी महर्षि व्यास के प्रश्न से जुड़ा है। इस पर्व को करने का मतलब सांसारिकता से विमुख हो जाना नहीं है।

माघ के बाद हमारे कृषि प्रधान देश में फसलें उगती हैं, आर्थिक सम्पन्नता आती है। यह सम्पन्नता वसंत ऋतु में हमारे माघ के वैराग्य को राग से जोड़ती है। गीता में कहा गया है-मन चंचल है, वह मनुष्य को मथ डालता है, परम शक्तिशाली है, उसकी गति को रोकना उसी तरह कठिन है, जैसे कोई हवा की चाल को नहीं रोक सकता। माघ पूर्णिमा को उपासना करने से मन की शक्ति प्रबल होती है। प्रबल संकल्प शक्ति के शिखर पर पहुंचा जा सकता है। मन को शुभ संकल्प में लगाना सबसे बड़ा पुरुषार्थ है। कमजोर मन वाला निराश, हताश, दुखी, अवसादग्रस्त मनुष्य सिर्फ हड्डी-मांस का ढांचा है। प्रबल सात्विक, पवित्र संकल्प के जरिये ही चारों पुरुषार्थ (धर्म-अर्थ-काम-मोक्ष) सफल होते हैं। परिवार, समाज, देश और मानवता का विकास होता है। संकल्पवान मन राष्ट्र की संपत्ति है। ब्रह्मांड में आनंद व्याप्त है, ब्रह्म सत-चित-आनन्द का स्वरूप है। दुख का बोध मन की निर्बलता की ओर इशारा करता है। माघ पूर्णिमा पर साधना करने का अर्थ है मन को शिव संकल्प में लगाना। प्रयाग यज्ञभूमि है, जो श्रद्धालु यहां आत्मा को एकाग्र कर मन की चंचलता पर नियंत्रण कर तप करता है, उसे अक्षय फल मिलता है। गंगा ऋग्वेद, यमुना यजुर्वेद और सरस्वती अथर्वेद का रूप हैं। गंगा समस्त नदियों की जननी हैं। वह समुद्रपूर्णी हैं।

कलियुग में प्रयाग तीर्थ का विशेष महत्व कहा गया है। माघ पूर्णिमा, महाविष्णु के रूप केशव, माधव की उपासना का विशेष पर्व है। ऋषियों ने कहा है- आकाश से बरसने वाला जल, जिस तरह समुद्र में मिल जाता है, उसी तरह श्रद्धालु चाहे किसी देवता को प्रणाम करें, उसे केशव ही स्वीकार करते हैं-
आकाशात पवित्रम यथा गच्छति सागरम।
सर्वदेव नमस्कारम केशवम प्रतिगच्छति।।

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