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विनम्रता से ईश्वर प्राप्ति

संत रविदास बचपन से ही बहुत धार्मिक प्रवृत्ति के थे। पिता रघु इस बात से नाराज थे कि जूते बनाने में वे सहयोग नहीं करते, जबकि रविदास रात को जाग-जाग कर  दिन का बचा कार्य पूरा किया करते थे। वे दिन में साधु-संतों के पास बैठते और उनके सत्संग में पद गाया करते थे। पिता ने उन्हें घर से निकाल दिया। रैदास ने विनम्रता से घर-निकाला स्वीकार किया। उनकी पत्नी बहुत अधिक साध्वी थीं। उन्होंने ससुर के घर के पीछे एक झोपड़ी बनाई, जिसमें रविदास रहने लगे। रविदास अलमस्त संत थे। वे परिश्रम करते और जो कुछ मांगना होता, ईश्वर से मांगते। काशी नरेश भी उनके शिष्य थे। एक बार काशी नरेश को पता चला कि संत रविदास और उनकी पत्नी बहुत आर्थिक परेशानी में हैं। वह उनकी कुटिया पर पहुंचे और सोने की मुद्राओं से भरा थाल देने लगे। संत रविदास ने कहा कि अभी उनका मूल्य इतना कम नहीं हुआ है। ईश्वर-भक्ति का इतना खजाना उनके पास है कि स्वर्ण मुद्राएं उसके सामने कुछ नहीं। उन्होंने कहा- मेरे राम ने मुझे बहुत दिया है। वह है मेरा! जो मांगना होगा, उससे ले लूंगा।

गोस्वामी तुलसीदास और मीराबाई भी संत रैदास के दर्शनों के लिए आया करते थे। कहा जाता है कि तुलसीदास ने जब मानस को पूरा किया तो संत रविदास को सुनाया था। मीराबाई ने उन्हें अपना गुरु माना था। यह भी प्रसिद्ध है कि रैदास स्वामी रामानन्द के सबसे प्रिय शिष्यों में से एक थे। स्वयं स्वामी रामानन्द उनके घर पर अनेक बार गए। रविदास अहंकार रहित होकर ईश्वर की आराधना करते। राजा-महाराजा उनके द्वार खड़े रहते, लेकिन वे भजन गाते-गाते जूते बनाते रहते। ऐसा विलक्षण संत मिलना असम्भव है।

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