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शिव को प्रिय है अष्टमी तिथि

अष्टमी तिथि का क्या महत्व है? इस तिथि को व्रत करने से क्या फल मिलता है?
-संजय वाष्ण्रेय, धनबाद, झारखंड

अष्टमी तिथि का नाम सुनते ही मन में या तो भादो में आने वाली कृष्ण जन्माष्टमी का ख्याल आता है या फिर मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष में धूमधाम से मनाई जाने वाली कालभैरव अष्टमी का। कालभैरव अष्टमी के दिन ही कार्तवीर्याजरुन ने भी अनघाष्टमी व्रत करके 25 हजार साल तक पृथ्वी पर अखंड शासन किया था। भगवान शिव को प्रिय अष्टमी तिथि से जहां बुधाष्टमी का स्मरण होता है तो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को पड़ने वाली दूर्वाष्टमी का भी। सोमाष्टमी व्रत की महिमा भी जगजाहिर है। पौष मास की कृष्णाष्टमी को शंभु नाम से महेश्वर का पूजन कर घृत प्राशन करने से वाजपेय यज्ञ का पुण्य फल प्राप्त होगा। यह हर माह की कृष्णाष्टमी को ही किया जाता है। मार्गशीर्ष मास के कृष्णपक्ष में शिवलिंग की पूजा और काले तिलों से हवन अवश्य करना चाहिए। गोमूत्र का पान कर रात में भूमि पर ही सोना चाहिए।

माघ मास में महेश्वर नाम से भगवान शिव को गाय के दूध से प्राशन और फाल्गुन मास में महादेव नाम से पूजा कर तिल भक्षण करना चाहिए। चैत्र मास में स्थाणु नाम से शिव का पूजन करें। यव का भोजन करने से अश्वमेघ यज्ञ का पुण्य मिलता है। वैशाख में शिव नाम से पूजा करें और कुशोदक पान करें। ज्येष्ठ में पशुपति नाम से पूजा कर गाय के दूध में गंगाजल मिला कर पीना चाहिए। आषाढ़ में उग्र नाम से पूजा करें गोमय प्राशन करें। श्रवण में शर्व नाम से पूजा करें और रात में अर्क प्राशन करें तो बहुत-सा सोना दान करने वाले यज्ञ का पुण्य प्राप्त होता है। भादों में त्र्यंबक नाम से पूजा करें और बेलपत्र खा लें। आश्विन में भव नाम से पूजा कर तण्डुलोदक का पान करें। कार्तिक में रुद्र नाम से भगवान शिव की पूजा कर रात्रि में दही का प्राशन करें तो अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है। एक साल पूजा करने के बाद शिवभक्त ब्राह्मणों को दान आदि करके व्रत पूरा करना चाहिए। यही व्रत करके इंद्र, चंद्र, ब्रह्म तथा विष्णु जी ने अपनी इच्छाओं को पूर्ण किया। जो भी यह व्रत करता है, उसे समस्त अभावों से मुक्ति मिलती है। और अंत समय आने पर शिवलोक की प्राप्ति होती है।

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