अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

पंचायती राज : करोड़ों खर्च के बाद भी आशानुरूप काम नहीं

जिले के लिए इससे बड़ी त्रासदी भला और क्या हो सकती है कि सरकार द्वारा करोड़ों रुपए खर्च किए जाने के बावजूद पंचायतों में कामकाज आशा के अनुरूप धरातल पर नहीं दिख रहा है। पंचायतों के माध्यम से किए जा रहे विकास कार्यो में न केवल लूट- खसोट मची है, बल्कि इसमें बिचालिये भी हावी हैं। पंचायत प्रतिनिधियों, सम्बद्ध पदाधिकारियों एवं बिचौलियों के बीच मची कमाने की होड़ ने विकास कार्य एवं उसकी गुणवत्ता को गौण कर दिया है।ड्ढr ड्ढr महिलाओं को 50 फीसदी आरक्षण मिलने के बाद उम्मीद थी कि अब महिलाएं घूंघट उठाकर घर की देहरी पार ग्रामीण विकास में अपनी महत्वपूर्ण भागीदारी देंगी, लेकिन आज भी महिलाएं रबर स्टाम्प ही बनी हैं। महिला प्रतिनिधियों का सारा काम उनके पति या पुरुष सगे-संबंधी ही करते हैं। यहां तक कि बैठकों में भी वही भाग लेते हैं। यही कारण है कि नौकरशाह पंचायत प्रतिनिधियों के नियंत्रण में नहीं हैं। हालांकि पहले की सरकार की तुलना में नीतीश सरकार में थोड़ा बहुत बदलाव देखने को मिल रहा है। लोगों में जहां जागरूकता आई है वहीं 12वीं वित्त योजना अंतर्गत सोलर लाइट, चापाकल, शौचालय, कल्वर्ट का निर्माण व सड़क मरम्मत कार्य कराये गये हैं। लेकिन इनमें भी लूट संस्कृति हावी होने से उनकी गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न् लग रहा है। इंदिरा आवास तो जिले की सभी 218 पंचायतों में अधूरे पड़े हैं। नरगा अंतर्गत विभिन्न योजनाओं की प्रगति का आलम यह है कि 13में 1223 योजनाएं अब भी अपूर्ण है। पंचायतों के विकास में तो बदलाव आया है। लेकिन भ्रष्टाचार के आकंठ में डूबे अधिकांश मुखिया में बदलाव तो नहीं आया है, नैतिकता का पतन जरूर हुआ है। इस बाबत पूछे जाने पर डीडीसी उमेश कुमार वर्मा ने बताया कि नरगा द्वारा विभिन्न पंचायतों में भौतिक रूप से लगभग 70 से 75 प्रतिशत काम किया जा चुका है। उन्होंने इस बात से इंकार किया कि धरातल पर विकास कार्य नहीं हो रहे हैं। कार्यो की गुणवत्ता व लूट खसोट के बार में पूछे जाने पर डीडीसी ने बताया कि इसकी जांच एसडीओ एवं अन्य मजिस्ट्रेट के अलावा स्वयं भी की है। महिला प्रतिनिधियों के पति हावीड्ढr अभिनन्दन कुमार लखीसरायड्ढr राज्य की पंचायतों में महिलाओं को मिले 50 फीसदी आरक्षण का असर दिखाई पड़ने लगा है। कल तक घर में दुबकी रहनेवाली महिलाएं अब संघर्ष कर रही हैं। यह 80 पंचायतों वाला जिला है। जिले के पिपरिया प्रखंड की सैदपुरा पंचायत की मुखिया वीणा देवी अपने प्रखंड के बीडीओ से पंचायत के विकास का कागज मांगती हैं तो सूर्यगढ़ा प्रखंड की गोपालपुर ग्राम पंचायत की मुखिया पिंकी देवी कहती हैं कि डीएम और एसपी से नजरं मिलाकर बात की तो मुझे लगा कि हां, अब मैं नेता बन गई हूं। महिलाओं के जनप्रतिनिधि बनने का सबसे ज्यादा असर विद्यालयों, अस्पतालों तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों पर पड़ा है।ड्ढr ड्ढr विद्यालयों में पढ़ाई अस्पतालों में इलाज तथा आंगनबाड़ी केन्द्रों के सही ढंग से संचालन को लेकर इन महिला जनप्रतिनिधियों ने अभियान छेड़ रखा है। कोई गर्भवती महिलाओं को अस्पताल पहुंचा रही है। तो कोई गांव वालों को समझा रही है कि बच्चों को टीका लगवाना जरूरी है। ग्रामीण इलाकों के स्वास्थ्य केन्द्रों पर गर्भवती महिलाओं की जो भीड़ जुट रही है उसमें महिला पंचायत प्रतिनिधियों की बड़ी भूमिका है। पंचायतों में लूट-खसोट भी चल रही है। पंचायतों को अधिकार भी मिला है लेकिन किसी भी पंचायत में ऐसा काम नहीं हो रहा है जो संतोषप्रद हो। शिक्षक नियोजन में तो काफी शिकायतें मिली हैं। पंचायतों में विभिन्न पदों पर बड़ी संख्या में महिलाएं चुनी गई हैं, पर सब कुछ के बावजूद अधिकांश जगहों पर काम काज महिला जनप्रतिनिधि के पति ही निबटाते हैं। प्रखंड एवं जिले में होनेवाली विभिन्न बैठकों में महिलाओं के साथ उनके पति भी जाते हैं। ऐसा भी देखा जाता है कि अगर पति को बैठक में जाने की मनाही होती है तो वे बाहर से ही मॉनिटरिंग करते हैं। इस जिले में नौकरशाही पंचायत प्रतिनिधियों के नियंत्रण में नहीं है। अफसर पंचायत प्रतिनिधियों की बात नहीं मानते हैं परिणामस्वरूप अधिकारियों एवं प्रतिनिधियों में हमेशा नोकझोंक होती रहती है। विकास कार्यों को अमलीजामा पहनाने में जो तारतम्य व सामंजस्य अफसरों एवं पंचायत प्रतिनिधियों में होना चाहिए उसका यहां सर्वथा अभाव है।ं

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title: पंचायती राज : करोड़ों खर्च के बाद भी आशानुरूप काम नहीं