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दिल्ली के तख्त पर तमिल दावेदारी

क्या हमारा देश अपना अगला प्रधानमंत्री तमिलनाडु से चुनने को तैयार है? इसमें कोई दोराय नहीं कि इस सूबे ने भारत की राजनीति में ऐतिहासिक तौर पर महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है, लेकिन प्रधानमंत्री पद इसके हिस्से में कभी नहीं आया। 1996 में इस शीर्ष पद का ताज इसके एक सपूत के बहुत करीब पहुंच गया था, लेकिन अंतत: वह फिसल गया और पड़ोसी राज्य कर्नाटक के सिर जा सजा। तो क्या इस साल जयराम जयललिता को यह गौरव हासिल हो सकता है? तमिलनाडु की मुख्यमंत्री ने अपने हिसाब से पासा फेंक दिया है कि अगर नई दिल्ली में एक गैर-कांग्रेसी, गैर-भाजपाई सरकार की सूरत बनती है, तो वह इस पद की प्रमुख दावेदार होंगी। जयललिता की यह चाहत 19 दिसंबर, 2013 को पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर सामने आई, जब उनकी पार्टी की चेन्नई में एक महत्वपूर्ण बैठक हुई थी। उस बैठक में शामिल उनके वफादारों ने बाकायदा यह प्रस्ताव रखा कि ‘उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात आदि दूसरे राज्यों से प्रधानमंत्री चुने जा चुके हैं, इसलिए अब वह वक्त आ गया है कि तमिलनाडु का कोई व्यक्ति देश का नेतृत्व करे।’ लोगों को अच्छी तरह से मालूम है कि इस ‘कोई व्यक्ति’ का क्या मतलब निकलता है। इस मौके पर जयललिता ने कहा कि ‘हमारी पार्टी सेंट जॉर्ज एक्सप्रेस बन चुकी है और यह छह बार सेंट जॉर्ज फोर्ट (तमिलनाडु का सचिवालय) तक की यात्रा कर चुकी है। हमारा यह सफर बेहद कामयाब रहा है। तीन बार एमजीआर के नेतृत्व में और तीन बार मेरी सदारत में। अब 2014 का आम चुनाव हमारे सामने है और हमें अपने आप को लालकिला एक्सप्रेस में तब्दील करना चाहिए, ताकि हम दिल्ली के लाल किले तक पहुंच सकें।’

साल 1996 में वामपंथी पार्टी माकपा के पोलित ब्यूरो ने यदि ‘ऐतिहासिक भूल’ न की होती, तो लाल किले पर उस वक्त वही काबिज होती। पश्चिम बंगाल के दिग्गज नेता ज्योति बसु दुनिया के इस सबसे बड़े लोकतंत्र का पहला वाम प्रधानमंत्री बनने को राजी हो गए थे, लेकिन ऐसा हो न सका। आखिरकार जनता दल के देवेगौड़ा के कंधों पर वह दायित्व आ टपका। उस वक्त संयुक्त मोर्चा के नेताओं की कई बैठकें हुई थीं, लेकिन वे सभी बैठकें इसलिए नाकाम रहीं, क्योंकि उत्तर भारत के किसी नेता के नाम पर सहमति नहीं बन पा रही थी। इसके बाद तय हुआ कि दक्षिण भारत से किसी को प्रधानमंत्री चुना जाए। पहली पसंद जीके मूपनार थे। उस समय वह तमिल मानेल्ला कांग्रेस के नेता थे। लेकिन कहा जाता है कि द्रमुक नेता करुणानिधि ने बड़ी खामोशी से उस प्रस्ताव को गर्त में धकेल दिया और तब कर्नाटक के एचडी देवेगौड़ा मुकद्दर के सिकंदर साबित हुए।

मूपनार की टांग खींचकर महत्वाकांक्षी करुणानिधि ने अपनी जमीन पर बराबर की प्रतिस्पर्धा को रोकने में उस वक्त भले ही कामयाबी हासिल कर ली हो, लेकिन तब उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि 18 साल बाद उनकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी जयललिता केंद्र की सत्ता के लिए इतनी मजबूती से अपनी दावेदारी पेश करेंगी। जयललिता की लालकिला एक्सप्रेस की तैयारी एक साल से भी अधिक समय से चल रही है। चेन्नई के तमाम महत्वपूर्ण इलाकों में दिखने वाले पोस्टरों और बैनरों के जरिये पार्टी कार्यकर्ताओं में काफी वक्त से उत्साह भरा जा रहा है कि वे जी-जान से जुट जाएं, क्योंकि इस बार पुडुचेरी की एक सीट समेत सभी 40 सीटों पर अम्मा की पार्टी को विजयी बनाना है। प्रधानमंत्री पद की इस दौड़ में जयललिता के कूदने के पीछे कई वजहें हैं।

67 साल की जयललिता तीसरी बार तमिलनाडु की मुख्यमंत्री बनी हैं और अब राज्य में उनके लिए कोई चुनौती नहीं बची है। मई 2011 के विधानसभा चुनावों में उन्होंने अपने चिर विरोधी करुणानिधि को बुरी तरह से धराशायी कर दिया और करुणानिधि इस करारी हार से अब शायद ही उबर सकें। अपने अतीत से सबक लेते हुए जयललिता ने इस बार तमिलनाडु को काफी परिपक्व प्रशासन दिया है। अपनी तीसरी पारी में उन्होंने बदले की राजनीति से खुद को दूर रखा है, फिर भी विपक्ष की नाक में नकेल डाले रखा है। हालांकि राज्य में बिजली की भारी कमी के कारण उन्हें कठिन चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, लेकिन उन्होंने इससे पैदा होने वाले असंतोष को काफी कुशलतापूर्वक साध भी लिया। वास्तव में, इस समय राज्य पर उनका काफी पुख्ता नियंत्रण है।

इस बार जयललिता केंद्र की राजनीति से कमोबेश दूर ही रही हैं। उन्होंने खुद को किसी विवाद का हिस्सा नहीं बनने दिया। उन्होंने भाजपा के साथ बातचीत का रास्ता तो खुला रखा, लेकिन उसके गठबंधन में शामिल होने को लेकर उन्होंने कोई उतावलापन नहीं दिखाया है। दरअसल, वह ज्यादा से ज्यादा सीटें जीतकर चुनाव के बाद राष्ट्रीय व क्षेत्रीय पार्टियों के साथ मोल-तोल का विकल्प खुले रखना चाहती हैं। अन्नाद्रमुक की नेता ने प्रधानमंत्री पद के लिए अपने नाम को बड़ी चतुराई से आगे बढ़ा दिया है। तमिलनाडु के चुनावों का सबसे खास कारक गठबंधन ही है और जयललिता बखूबी जानती हैं कि इस वक्त उनकी स्थिति बेहद सुदृढ़ है। इसलिए उन्होंने अभी तक सिर्फ वामपंथी पार्टियों से गठजोड़ किया है और इसकी बदौलत उन्हें दो फायदे मिल गए हैं- एक, वाम दलों के पास तमिलनाडु में पांच फीसदी वोट तो है, लेकिन सीटों के लिए वे कोई सौदेबाजी की हैसियत नहीं रखते। दूसरा लाभ यह है कि वाम पार्टियां तमिलनाडु के बाहर उनके लिए राष्ट्रीय गठबंधन बुनने में अहम भूमिका निभा सकती हैं।

फिर यह सेकुलर सुर राज्य में ईसाइयों व मुसलमानों के संयुक्त रूप से 10 प्रतिशत वोटों को भी उनकी तरफ कर सकता है। तमिलनाडु में नरेंद्र मोदी की रैली में भले ही बड़ी भीड़ जुटी, लेकिन यह कहना मुश्किल है कि वह भीड़ वोट में कितना बदलेगी। भाजपा के लिए वहां सबसे बेहतर स्थिति 1998 में रही, जब उसने पांच में चार सीटों पर फतह हासिल की थी। लेकिन तब कोयंबतूर बम धमाके का उसे काफी लाभ मिला था। गौरतलब है कि उस धमाके के निशाने पर लालकृष्ण आडवाणी थे। उसके एक साल बाद ही डीएमके के साथ साझेदारी करके उसने चुनाव लड़ा और वह सिर्फ तीन सीटें जीत सकी थी। इस बार भाजपा ने एमडीएमके और आईजेके जैसी पार्टियों के साथ पहले से करार कर रखा है। मगर इन दोनों पार्टियों का राज्य में बहुत सीमित प्रभाव है। बहरहाल, अगर जयललिता तीसरे मोर्चे का इंजन बनती हैं, तब भी यह मुमकिन नहीं दिखता है कि वह भाजपा या कांग्रेस की मदद के बिना सरकार बना लें। यह संभव नहीं लगता है कि दोनों राष्ट्रीय पार्टियों की सीटों की संयुक्त ताकत 272 के जादुई आंकड़े से पीछे रह जाए। इसलिए जयललिता की लालकिला एक्सप्रेस को लाल किला तक पहुंचने में काफी दुश्वारियों से जूझना पड़ेगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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