DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

कहीं हम इस तकनीक में पिछड़ न जाएं

विज्ञान कांग्रेस में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का भाषण जेनेटिकली मॉडीफाइड यानी जीएम फसलों के मामले में उम्मीद जगाता है। लगता है कि सरकार जीएम फसलों के मैदानी परीक्षणों की अनुमति देने के लिए कुछ कदम उठा रही है। बेशक, यह अनुमति कड़ी शर्तों के साथ मिलेगी। यह संजीदा मुद्दा फिलहाल सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जहां इसे लेकर सरकार के दो मंत्रालयों में ही मतभेद हैं। एक और उम्मीद इसलिए भी बनती है कि हाल ही में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी कहा है कि जीएम फूड के बारे में लोगों को शिक्षित किया जाना चाहिए, ताकि उनके मन से भय को निकाला जा सके। हालांकि, कोई यह दावा नहीं कर रहा है कि जीएम तकनीक हमारी हर समस्या का रामबाण समाधान है। लेकिन जब सभी परंपरागत तरीके एक हद से ज्यादा परिणाम नहीं दे पा रहे हों, तब हमें ऐसी तकनीक अपनानी ही चाहिए, जो हमें और आगे ले जाए। ऐसे व्यावहारिक समाधान पेश करने की सबसे अधिक संभावना जीएम तकनीक में ही देखी जा रही है। अफसोस की बात है कि एक शक्तिशाली धड़ा इस बात को नहीं समझ रहा है कि कृषि में बायोटेक का विरोध करना विज्ञान की गति को रोकना है।

यह विज्ञान अपने आप में बुरा नहीं है, यह हम पर निर्भर करता है कि समाज के हित में हम उसका किस तरह उपयोग करते हैं। यह जरूर है कि इसे सिर्फ बाजार और जरूरत के हिसाब से ही नहीं देखा जाना चाहिए। जीएम फूड को अपनाने से पहले सख्त नियम, सुरक्षा के उपाय, उनके प्रभावों का मूल्यांकन और इसकी कड़ी निगरानी काफी जरूरी है। यह हमारी खाद्य सुरक्षा के लिहाज से भी जरूरी है और कृषि लागत को घटाने के लिहाज से भी। बीटी कॉटन के मामले में हम पहले ही देख चुके हैं कि इसका इस्तेमाल होने के बाद भारत दुनिया में कपास का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक बन चुका है। पहला नंबर चीन का है, जो तकरीबन हर फसल में जीएम तकनीक को अपनाकर सबसे आगे निकलने की ठान चुका है। ऐसे में ढीला रवैया हमें उसके मुकाबले बहुत पीछे कर सकता है।

ऐसे में, प्रस्तावित बायोटेक्नोलॉजी रेगुलेटरी अथॉरिटी ऑफ इंडिया (बीआरएआई) विधेयक को पास करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। यह ऐसी स्वतंत्र व्यवस्था होगी, जो जीएम फसलों के गुण-दोष का निष्पक्ष आकलन करेगी और इसकी इजाजत देगी। साथ ही यह भी जरूरी है कि इसे लेकर बनी तमाम भ्रांतियों को खत्म किया जाए। ऐसी भ्रांति फैलाने वालों का दुष्चक्र पिछले कुछ समय में बहुत मजबूत हुआ है। यह काम बहुत तेजी से करना होगा। किसी भी फसल का मैदानी परीक्षण शुरू होने के बाद उसकी व्यावसायिक पैदावार प्राप्त करने तक 10-15 साल का समय लग सकता है। दुनिया के बाकी देशों में बाधाएं उतनी नहीं हैं, जितनी हमारे यहां हैं, इसलिए इस मामले में हम काफी पिछड़ सकते हैं।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:कहीं हम इस तकनीक में पिछड़ न जाएं