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संसद और देश का शून्यकाल

संसद में शून्यकाल होता है। हर माननीय इस दौरान जो जी चाहे, बोलने को आजाद है। यह सन्नाटे का नहीं, शोर का समय है। सड़क पर उस का प्रभाव होना ही होना है। विचारक भी मानते हैं कि कोलाहल का थोड़ा-बहुत अतिरेक किसी भी जीवंत शहर की निशानी है। देश ने इतनी तेजी से तरक्की की है कि चौड़ी से चौड़ी सड़क पर भी तिपहिये, दुपहिये और चार पहियों के वाहन ऐसे छाए हैं कि आदमी सशंकित ही नहीं, असुरक्षित भी महसूस करे कि चलें, तो चलें कहां? प्रगति  के अगले दौर में हमें तो अधर से लटके पैदल पथ का इंतजार है। मुल्क में शंकालु व्यक्तियों की भरमार है। वे अविश्वसनीय किस्म की बातें करते हैं। कहते हैं कि असलियत में सड़क का असर संसद पर पड़ा है। यहां भी ध्वनि-प्रदूषण है, वहां भी। सड़क के निर्णय सड़क-छाप होते हैं। कभी गुस्साए ड्राइवर ने बिना बात दूसरे को पीट दिया, कभी भीड़ ने किसी बेगुनाह को।

संसद में सब अहिंसा के सैद्धांतिक पक्षधर हैं। ये कोरी अफवाहें हैं कि कई दागी सांसद हैं। चुनाव जीते हैं, तो जरूर उन्होंने जनता की सेवा की होगी, वरना चुने कैसे जाते? जब जनमत का चमत्कारी साबुन आपातकाल के सामूहिक अपराध को धो सकता है, तो व्यक्तिगत गुनाहों की हैसियत ही क्या है?
गाहे-बगाहे ऐसों पर उनका अतीत हावी होता है। वह विरोधी के विरुद्ध आक्रामक मुद्रा में बाहें चढ़ाते हैं और अचानक अपनी अदृश्य मूंछ को नीचा कर लेते हैं। वह जानते हैं कि संसदीय जंग मौखिक तकरीर, तर्क और गिनती के गणित से होती है, बाहुबल से नहीं। इसका उपयोग संसद के बाहर ही उचित है। सड़क पर उनका कानून चलता है। जब चाहें, जिसे टपकवा दें, उठवा दें। इन सबके बावजूद हमें लगता है कि देश के विकास की गलियां, गांव, शहर, रास्ते, जनपथ आदि संसद से प्रभावित हैं। हर जगह सिर्फ चीख-चिल्लाहट है, नतीजा कुछ हो न हो। मंच से नेता वोट के लिए चीखते हैं, नीचे जनता भूख, महंगाई और भ्रष्टाचार से। सबको आजादी है, समर्थ को ठगने की और असमर्थ को ठगे जाने की। संसद के शून्यकाल की समय सीमा है। देश का शून्य-काल तो दशकों से चालू है?

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