DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

सबके भीतर छिपा है वसंत

वसंत खिलने की ऋतु है। यह रंग और गंध का उत्सव है। इन दिनों हरियाली कुछ ज्यादा ही हरी होती है, धूप कुछ ज्यादा ही उजली दिखती है और छोटे-छोटे घास के पौधे भी अपनी खुशी फूल बनकर जाहिर करते हैं। कलियों और भौरों के बीच की गुफ्तगू इस कदर मदहोश करने वाली होती है कि समूचा निसर्ग गुनगुनाने लगता है। हमारे कवियों ने वसंत पर जितने गीत लिखे हैं, उतने शायद ही किसी अन्य ऋतु पर लिखे हों। संगीतकारों ने तो इस ऋतु के लिए एक राग भी बना दिया, राग वसंत। भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने भी सर्वश्रेष्ठ बातों की गिनती करते हुए वसंत को शीर्ष स्थान दिया, ‘मैं ऋतुओं में वसंत हूं।’ वसंत सभी ऋतुओं में श्रेष्ठ है। लेकिन ऐसी क्या खूबी है वसंत में?
ओशो ने इसकी बहुत गहरी व्याख्या की है। वह वसंत को एक सृजन की क्रिया की तरह देखते हैं। वसंत वह स्थिति है, जो किसी भी वस्तु की परम खिलावट है, परम अवस्था है।

इसमें पूरे जगत के विकास की बात है। अस्तित्व एक विकास का सिलसिला है। हर चीज एक बीज की तरह पैदा होती है, और हर बीज की नियति होती है फूल बनना। वह बन पाता है या नहीं, यह दूसरी बात है। जैसे फूल या फल बीज की आखिरी संभावना है, वैसे ही वसंत हर जीवित वस्तु की खिलावट है। हम सबके भीतर अपना वसंत छिपा हुआ है, इन अर्थों में वसंत को ऋतुराज कहा गया है। ओशो कहते हैं, जो ऋतु वसंत नहीं हो पाई, वह ऋतु होने से वंचित हो गई है। श्रीकृष्ण सिर्फ इतना ही कहते हैं कि मैं प्रत्येक के स्वभाव की सिद्धि हूं। जो हो सकता है चरम शिखर पर, वह मैं हूं। ऋतुओं में खिला हुआ, फूलों से लदा हुआ उत्सव का क्षण वसंत है। जहां जीवन उत्सव मनाता हो, जहां जीवन खिल उठता हो, जहां सभी बीज अंकुरित होकर फूल बन जाते हों, वह मैं हूं।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:सबके भीतर छिपा है वसंत