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विश्व युद्ध में कंप्यूटर

नई पीढ़ी को शायद ही यह मालूम हो कि डाकघर क्या होता है और इसका महत्व कुछ ही साल पहले क्या होता था। मोबाइल और इंटरनेट में ही आंख खोलने वाली पीढ़ी को टेलीफोन एक्सचेंज भी कोई अनजानी-सी जगह लग सकती है। बीसवीं शताब्दी में ये चीजें असाधारण महत्व की थीं और कई ऐतिहासिक घटनाओं से जुड़ी थीं। मसलन, अब ब्रिटेन में विश्व युद्ध के दौरान की कुछ खुफिया जानकारी के उजागर होने से पता चला है कि ब्रिटिश डाक विभाग के कुछ इंजीनियरों ने, जिसके तहत टेलीफोन का इंतजाम भी होता था, 70 साल पहले एक विशाल कंप्यूटर बनाया था। इस कंप्यूटर का इस्तेमाल जर्मनी के तानाशाह एडॉल्फ हिटलर और उसके सेनापतियों के गुप्त संदेशों को पढ़ने के लिए किया गया था। उस दौर में माइक्रोचिप तो होते ही नहीं थे, यहां तक कि ट्रांजिस्टर भी अस्तित्व में नहीं आए थे। उन्होंने उस दौर में टेलीफोन एक्सचेंज में इस्तेमाल होने वाले रिले, वाल्व और ऑटोसिलेक्टर इस्तेमाल करके पहला इलेक्ट्रॉनिक डिजिटल कंप्यूटर बनाया, जिसका आकार लगभग एक कमरे जितना था।

इसका नाम भी ‘कोलोसस’ यानी विशाल ही था। यह कहा जाता है कि इस कंप्यूटर की मदद से जो गुप्त संदेश पढ़े जा सके, उनकी वजह से दूसरे विश्व युद्ध को जीतने में मित्र शक्तियों को बहुत सहायता मिली। और हम मान सकते हैं कि हजारों जिंदगियां इससे बचीं। युद्ध के दौरान संदेशों के लिए सभी सेनाएं संकेतों की गुप्त भाषा इस्तेमाल करती हैं। जर्मनी में उच्च स्तर पर जो संदेश दिए जा रहे थे, वे अंग्रेज सेना के तकनीकी लोग पकड़ तो रहे थे, लेकिन उन्हें खोल नहीं पा रहे थे।

एक बार एक जर्मन ऑपरेटर की गलती से एक अंग्रेज गणितज्ञ को उस गुप्त संकेत भाषा में घुसने का रास्ता मिल गया और उसने बड़ी मेहनत से उसमें एक पैटर्न ढूंढ़ निकाला। लेकिन उस पैटर्न को तमाम संदेशों पर लागू करके उन संदेशों को पढ़ने के लिए बड़े पैमाने पर गणित करने की जरूरत थी और इसे अगर गणितज्ञ करते, तो कई सारे लोग, बहुत सारी मेहनत और समय लगता। इसके लिए एक पोस्ट ऑफिस इंजीनियर टॉमी फ्लॉवर्स ने एक मशीन का डिजाइन बनाया और कई सारे इंजीनियरों और टेक्नीशियनों ने मिलकर ऐसी दस मशीनें बनाईं, जो ढेर सारे समाधान तुरत-फुरत कर सकती थीं। इसके बाद कुछ ही गणितज्ञों की एक टीम उन मशीनों की मदद से जर्मन गुप्त संदेशों को पढ़ने लगी और इससे युद्ध में जर्मनी की अगली चालें मित्र शक्तियों को पता चलने लगीं। कोलोसस को युद्ध के बाद भी गुप्त ही रखा गया और उसके निर्माण से जुड़े सारे कागज जला दिए गए। गुप्त रखने की एक वजह यह भी थी कि दो मशीनों को युद्ध के बाद बचा लिया गया और उनका इस्तेमाल दूसरे देशों के गुप्त संदेश पढ़ने में किया जाता रहा।

युद्ध अपने आप में विध्वंसक होते हैं, लेकिन सभ्यता की शुरुआत से इंसान युद्ध लड़ता रहा है। इस विध्वंसक काम में इंसान की इतनी रचनात्मक ऊर्जा खर्च होती है कि आखिरकार उसके कुछ रचनात्मक नतीजे भी विध्वंस के बीच बच जाते हैं। कई सारी टेक्नोलॉजी, जो हमारी सुविधा के लिए इस्तेमाल होती है, उसको युद्ध के लिए बनाया गया था। इसमें कई दवाओं से लेकर अंतरिक्ष टेक्नोलॉजी तक शामिल है। सूचना प्रौद्योगिकी के विकास में भी युद्धों का बड़ा योगदान रहा है। कोलोसस इस बात का एक उदाहरण है। खाने को कई दिन तक ताजा बनाए रखने की टेक्नोलॉजी फौजी जरूरत के लिए ही विकसित हुई है। बॉल पेन भी फौजियों के लिए ही बने थे। युद्धों के विनाश के बिना अगर ये फायदे मिल पाएं तो क्या कहने, लेकिन इंसान कब लड़ने से बाज आता है?

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