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टोल टैक्स की राजनीति

बीते दिनों महाराष्ट्र में मनसे के अध्यक्ष राज ठाकरे ने अपने कार्यकर्ताओं का आह्वान किया कि वे टोल टैक्स न दें और टोल टैक्स वसूलने वाले नाकों को ध्वस्त कर दें। राज का आह्वान हुआ नहीं कि गुंडागर्दी शुरू हो गई। ऐसा नहीं कि यह हंगामा कोई पहली बार हुआ हो। इससे पहले हरियाणा और उत्तर प्रदेश में भी टोल टैक्स के खिलाफ आंदोलन हुए थे। पर वे आंदोलन इतने हिंसक न थे। यह दुर्भाग्य है कि हमारे नीति-नियंता ही अब हिंसक विरोध-प्रदर्शन की भाषा बोलने लगे हैं। निजी-सार्वजनिक भागीदारी में बनी सड़कों की कीमत कंपनियां कब का वसूल चुकी होती हैं, पर जनता को लूटने का काम जारी रहता है। एक सीमा के बाद टोल टैक्स की दरें घटनी चाहिए, न कि बढ़नी। लेकिन जो गुंडागर्दी मनसे के कार्यकर्ताओं ने दिखाई, उस पर भी अंकुश जरूरी है।
इंद्र सिंह धिगान, किंग्जवे कैंप, दिल्ली

आखिर सच क्या है

दिल्ली में बिजली वितरण कंपनियां घाटा बताकर बिजली कटौती की बात कर रही हैं। उधर, दिल्ली में सरकार बनने से पहले ही आम आदमी पार्टी ने बिजली के दाम आधे करने का वायदा किया था। इस पर अमल भी हुआ। लेकिन बिजली कटौती होने की स्थिति में जनता इस पार्टी से नाराज हो जाएगी। सरकार घाटा और घपले, दोनों की जांच के लिए बिजली कंपनियों के खातों की ऑडिट करवाना चाहती है। लेकिन इसमें राजनीतिक व कानूनी पेच हैं। अब बिजली उपभोक्ता क्या करें? या तो वे फिर से पुरानी दरों को अपनी नियति मान लें या फिर बिजली कटौती के लिए तैयार रहें। बिल न भरने वालों को आप सरकार कहती है कि शीघ्र ही ये आधे बिल किस्तों में जमा करेंगे और आधे सरकार भरेगी। यह कैसा फॉर्मूला है, जो नियमित रूप से बिल चुकाते रहे हैं, वे कटौती झेलें और जो न करें, उन्हें रियायत मिले। दिल्ली में बिजली बिल के खेल को जनता समझना चाहती है। जानना चाहती है कि कौन सच्चा है और कौन झूठा?
गुप्ता दाड़ी वाला, सदर बाजार, दिल्ली-6

आमने-सामने हो बहस

इधर टेलीविजन चैनल खबर के लिए कम और बहस के लिए ज्यादा जाने जा रहे हैं। प्राइम टाइम में तो बहस और नोकझोंक ही है। हर नेता अपनी बात कहता है और दूसरे की बात काट देता है। कोई कुछ बोले, इससे पहले एंकर लपककर बीच में आ जाता है और अपनी मौजूदगी का झूठा एहसास कराता है। ऐसे में, चर्चा खिचड़ी बन जाती है, वह किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचती। अच्छा तो यह होता कि न्यूज चैनल वाले दो बड़े और जिम्मेदार लोगों को आमने-सामने बिठाते और बहस की शुरुआत करते। जैसे मनमोहन सिंह हों, तो दूसरी तरफ मोदी या केजरीवाल हों। अमेरिका में यह दिखता है कि राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार टीवी चैट शो में आमने-सामने होते हैं, न कि पार्टी प्रवक्ता। इससे कौन ज्यादा दूरदर्शी और अच्छी नीतियों का मालिक है, यह पता चल जाता है। लेकिन अपने यहां यह तरीका नहीं है। ऐसे में, टीवी चैनल इस आइडिया को उठाकर सार्थक बहस की शुरुआत कर सकते हैं।
हरिओम मित्तल, गुड़गाव, हरियाणा

दूध के दाम

अलीगढ़ दूध विक्रेता संघ ने दूध के दामों में एक फरवरी से वृद्धि कर दी है। महंगाई के अलावा, पशुपालन की घटती प्रथा और मवेशी हत्या के कारण दूध के दाम हर कुछ अंतराल पर बढ़ जाते हैं, जबकि चिकित्सा विज्ञान कहता है कि दूध एक ‘संतुलित आहार’ है। इसमें प्रोटीन, विटामिन सब कुछ है। बच्चों के लिए यह आहार पौष्टिक कहलाता है, किंतु कितने मासूमों को यह नसीब हो पाता है? इसलिए महंगाई को रोकना होगा। पशुपालन उद्योग को बढ़ावा देना होगा। और मवेशियों की हत्या को भी रोकना होगा। यदि सरकार अब भी नहीं चेतीं, तो भविष्य में दूध का दाम पेट्रोल से भी बढ़ जाएगा। एक और बात, दूध में मिलावटखोरी को भी सख्ती से रोकना होगा।
रेखा गुप्ता, आगरा
rekhaprashant81@gmail.com 

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