DA Image

अगली स्टोरी

class="fa fa-bell">ब्रेकिंग:

‘यही प्यार की ताकत है’

नारायण मूर्ति की पत्नी के रूप में वे भले ही पहचानी जाती हों, पर वे भारत की कुछ शुरुआती महिला कंप्यूटर इंजीनियरों में से भी एक हैं। सुधा मूर्ति लेखक भी हैं और समाज सेवी भी। यहां प्रस्तुत हैं ‘पावर ऑफ लव’ नाम से लिखे उनके एक पत्र के कुछ अंश..

मैं, मूर्ति से पहली बार पुणे में अपने दोस्त प्रसन्न के जरिए मिली थी। प्रसन्न जो किताबें मुझे पढ़ने को देता था, उस पर मूर्ति का नाम लिखा होता था। ऐसे में एक मूर्ति की एक छवि पहले से बन गयी थी। उम्मीद से विपरीत मूर्ति एक शर्मीले और शांत व्यक्ति नजर आए। जब उन्होंने डिनर के लिए हमें आमंत्रित किया तो लगा कि वे शायद बहुत जल्दी से आगे बढ़ रहे हैं। मैंने मना कर दिया क्योंकि मैं पूरे ग्रुप में एक मात्र लड़की थी। खैर.. समय 7:30 बजे निश्चित हुआ और हम मिले।

..एक रोज रात के खाने के बाद उन्होंने कहा, मेरा कद 5’4’’ है, मैं एक निम्न मध्यम आय वर्ग से हूं। मैं कभी जीवन में बहुत अमीर नहीं बन पाऊंगा। तुम सुंदर हो और मेधावी भी। जिसको चाहोगी वह तुम्हें मिल जाएगा। क्या मुझसे शादी करोगी? मैंने कुछ समय मांगा।

..जब मैं हुबली गयी तो मैंने मां-पिता को मूर्ति के प्रस्ताव के बारे में बताया। मां खुश थी, पर पिता के मन में कई सवाल थे। उस समय वे रिसर्च असिस्टेंट थे और मुझसे कम कमाते थे। पिता ने फैसला नहीं में सुनाया।..मैंने पिता को कहा कि मैं उनके आशीर्वाद से ही शादी करूंगी, पर मूर्ति के सिवा किसी और से नहीं। पिता की शर्त थी कि वे एक स्थायी नौकरी करें, पर मूर्ति ने मना कर दिया। इस तरह मैं अपने जीवन के दो प्रमुख पुरुषों के बीच फंसी हुई थी।

..अगले तीन साल ऐसे ही चलते रहे। इस बीच उन्होंने अपनी कंपनी भी शुरू की। 1977 में मूर्ति ने बॉम्बे में पटनी कंप्यूटर्स में जीएम की नौकरी करने का मन बनाया, पर उससे पहले वे शादी करना चाहते थे, क्योंकि उन्हें ट्रेनिंग के लिए अमेरिका जाना था। अब पिता को भी ऐतराज नहीं था। मैं अमेरिका चली गयी। मूर्ति ने मुझे अकेले अमेरिका देखने के लिए प्रेरित किया। मैंने तीन महीने पिट्ठू बैग के साथ अमेरिका खूब घूमा। अनुभव खास रहा।

..1981 में वे इंफोसिस शुरू करना चाहते थे। उनके पास विजन था, पर पूंजी नहीं। मैंने उन्हें अपने संकट के समय के लिए बचाए 10000 रुपये दिए और कहा कि अपने सपने पूरे करो। मैंने उन्हें तीन साल का समय दिया और कहा इस बीच घर की सभी जरूरतें मैं पूरी करूंगी। ..एक बार नंदन नीलकेणी ने कहा कि मुझे बोर्ड में होना चाहिए, पर मूर्ति बोले वे नहीं चाहते कि बोर्ड में पति-पत्नी दोनों साथ काम करें। साथ यह भी कहा कि यदि तुम इंफोसिस में काम करना चाहती हो, तो वे पूरी खुशी के साथ खुद को बाहर कर लेंगे। मैं दुखी थी, पर मूर्ति को उस कंपनी से दूर नहीं कर सकती थी, जो उन्होंने खड़ी की। पर बाद में मूर्ति का कारण भी समझ आया। इंफोसिस को सफल बनाने के लिए ऐसे लोगों की जरूरत थी, जो अपना 100% दे सकें। यदि हम दोनों पूरा समय वहां देते तो परिवार का क्या होता। मैंने होम मेकर बनना स्वीकार किया। यह बड़ा त्याग था, पर दोनों में से किसी को करना था। आज भी मूर्ति कहते हैं,‘मैंने तुम्हारे करियर को सीढ़ी बनाकर अपना करियर बनाया। तुम मेरी सफलता के लिए जिम्मेदार हो।’ शायद यही प्यार की ताकत है।

  • Hindi Newsसे जुडी अन्य ख़बरों की जानकारी के लिए हमें पर ज्वाइन करें और पर फॉलो करें
  • Web Title:‘यही प्यार की ताकत है’