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फ्लाइंग सिख के नाम से मशहूर मिल्खा सिंह ने तमाम कठिनाइयों से जूझते हुए एथलेटिक्स के क्षेत्र में भारत का नाम रोशन किया। पद्मश्री से सम्मानित मिल्खा सिंह ने 400 मीटर रेस में जो ऊंचाइयां छुईं, वह उनके बाद देश का कोई खिलाड़ी नहीं छू सका। हाल ही में उन पर बनी फिल्म भाग मिल्खा भाग ने भी काफी शोहरत बटोरी। पेश हैं, उनके एक भाषण के अंश:

बढ़ती उम्र
मुझे यहां इस मैराथन में बुलाने के लिए आप सबका बहुत-बहुत शुक्रिया। पिछले कुछ दिनों से मैं काफी व्यस्त था। जबसे भाग मिल्खा भाग फिल्म रिलीज हुई है, लोग मुझे फिर से याद करने लगे हैं। लोगों का इतना प्यार और इतनी इज्ज्त पाकर बेहद खुशी होती है। रोजाना ढेर सारे खत आते हैं। मैं कोशिश करता हूं कि उन सभी खतों को पढ़ं और उनका जवाब दूं। आजकल मैंने बाहर आना-जाना बहुत कम कर दिया है। यह उम्र का तकाजा है। मेरी उम्र काफी हो चुकी है, जल्द ही 85 साल का होने वाला हूं। अब मेरे लिए यात्रा करना आसान नहीं रहा। अक्सर पीठ में दर्द रहता है। आंखों की रोशनी भी काफी कमजोर हो गई है। आप सब मेरे सामने बैठे हैं, पर मैं दूर बैठे लोगों  के चेहरे ठीक से नहीं देख पा रहा। मुझे भाषण देना नहीं आता, फिर भी यहां आप सबके बीच आया हूं, तो कुछ बातें जरूर कहूंगा आपसे।

एक और मिल्खा
मैं जिस भी कार्यक्रम में जाता हूं, लोग मिल्खा सिंह के बारे में बहुत बातें करते हैं, तारीफ करते हैं। यकीनन, मुझे बहुत अच्छा लगता है। मुझे इतनी इज्जत और मान देने के लिए शुक्रिया। पर मुझे एक बात बहुत खलती है। मुझे ओलंपिक में दौड़े हुए 60 साल हो गए। पर इतने दशकों में हम दूसरा मिल्खा सिंह नहीं पैदा कर सके। सवा अरब आबादी वाले इस विशाल देश में दूसरा मिल्खा क्यों नहीं पैदा हुआ? यह बात मुझे झकझोरती है। आखिर क्या वजह है कि हम युवाओं को खेल के प्रति उत्साहित नहीं कर पा रहे हैं? खेल के मामले में हमसे कहां चूक हो रही है, यह जानने की जरूरत है।

मेरी ख्वाहिश
मुझे आज भी याद है 1960 का वह दौर, जब रोम ओलंपिक में मुझसे गोल्ड मेडल फिसल गया था। वह टीस आज भी मेरे अंदर है। मैं चाहता हूं कि मेरे देश का कोई लड़का या लड़की ओलंपिक गोल्ड मेडल जीतकर आए। मैं ओलंपिक के मैदान में अपने देश के खिलाड़ी को तिरंगा लहराते और गोल्ड मेडल चूमते हुए देखना चाहता हूं। यह मेरी दिली ख्वाहिश है और मैं चाहता हूं कि आप नौजवान इसे पूरा करें। उम्मीद करता हूं कि आप मुझे निराश नहीं करेंगे।

इच्छाशक्ति
मैं आप सबको एक शेर सुनाना चाहता हूं। आप इसे ध्यान से सुनना। मैं जानता हूं कि आप इसका मतलब आसानी से समझ जाएंगे। शेर कुछ इस तरह से है- हाथ की लकीरों से जिंदगी नहीं बनती, अजम हमारा भी कुछ हिस्सा है जिंदगी बनाने में। अजम उर्दू का शब्द है। इसका मतलब है, इच्छाशक्ति। यह शेर सबके ऊपर पर लागू होता है। चाहे वह बिजनेसमैन हो, खिलाड़ी हो, डॉक्टर हो या फिर इंजीनियर। सच यह है कि सिर्फ हाथ की लकीरों से कुछ नहीं होता। आप ज्योतिष के पास जाएंगे, तो  वह आपको बड़े-बड़े सपने दिखाएगा। वह कहेगा, आपका भाग्य तेज है, आप डॉक्टर बनोगे, इंजीनियर बनोगे। आपकी राजनीति में रुचि है, तो वह कहेगा कि आप मुख्यमंत्री बन जाओगे। मैं ऐसी बातों में यकीन नहीं करता। मेरी सलाह है कि कुछ पाने के लिए आपके अंदर मजबूत इच्छाशक्ति होनी चाहिए। इच्छाशक्ति ही आपको भरपूर मेहतन करने और मुश्किलों से लड़ने का हौसला देती है। बिना मेहनत के कुछ नहीं मिलना वाला है।

जीरो से हीरो
मेरी राह आसान नहीं थी। मैं मानता हूं कि जिस इंसान के अंदर अनुशासन है, हौसला और ईमानदारी है, वह जमीन से उठकर आसमान को छू सकता है। जज्बे वाले इंसान को आगे बढ़ने से कोई नहीं रोक सकता। आप भी आसमान छूने की हिम्मत कर सकते हैं, आप भी जीरो से हीरो बन सकते हैं। मैं मिल्खा सिंह इस बात का उदाहरण हूं। बच्चो, अगर आपको आगे बढ़ना है, तो मेहनत के अलावा और कोई रास्ता नहीं है आपके सामने। आप मेहनत के जरिये तरक्की और शोहरत पा सकते हैं। भाग्य के भरोसे कुछ नहीं मिलने वाला। जब मैंने दौड़ना शुरू किया      था, तब मुझे कुछ नहीं पता था। मुझे यह भी नहीं पता था कि ओलंपिक खेल क्या है? मुझे नहीं पता था कि एशियन गेम्स क्या है? मैं इन खेलों की अहमियत नहीं जानता था। पर जब मुझे पता चला कि वल्र्ड रिकॉर्ड क्या है, खेल में रिकॉर्ड बनाने के मायने क्या हैं, तो मैंने तय कर लिया कि मैं रिकॉर्ड जरूर बनाऊंगा। इसके लिए चाहे जो भी करना पड़े। मैं जानता हूं कि रिकॉर्ड यों ही नहीं बनते, मशक्कत करनी पड़ती है। पर आप ठान लें, तो यह असंभव नहीं है। मैं चाहता हूं कि मेरी सामने बैठी इस भीड़ में से कोई युवा मिल्खा सिंह बनकर निकले। आप सब में से कोई वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाए। ओलंपिक के मैदान में तिरंगा लहराए।

बेटियों को बचाएं
आज की इस मैराथन का मकसद बेटियों के बारे में जागरूकता फैलाना है। मैं इसी बात पर फोकस करते हुए कहना चाहता हूं कि मेरी तीन बेटियां हैं और मैं उनसे बहुत प्यार करता हूं। मैंने अपने परिवार में बेटों से ज्यादा बेटियों का तवज्जो दी है। वह पुराना जमाना गया, जब लोग कहते थे कि बेटियों को पढ़ाने से क्या फायदा, वे तो घर का कामकाज ही करेंगी। जो लोग बेटियों के जन्म पर दुखी होते हैं, मैं उनसे कहना चाहता हूं कि देश के राजे-महाराजे और बड़े मशहूर लोगों को जन्म देने वाली महिला किसी की बेटी ही तो रही होगी। मुझे खुशी है कि आप लोगों ने इस मैराथन के जरिये लोगों को बेटियों के प्रति जागरूक बनाने का सिलसिला शुरू किया है। आप सब संकल्प कीजिए कि बेटियों को नजरअंदाज नहीं करेंगे। हम बेटियों को प्यार करेंगे और उन्हें तरक्की के बराबर मौके देंगे। 
प्रस्तुति: मीना त्रिवेदी

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