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हिंदी कविता का मूंछोत्तर काल

बहुत-सी चीजें गायब हुई हैं, जैसे गधे के सिर से सींग गायब हुए हैं, आदमी की पूंछ गायब हुई है, कई बोलियां भी गायब हुई हैं। जो गायब हुआ है, उसके बारे में एक-दो कवि चिल्लाए भी हैं। लेकिन कवि की सबसे अजीज चीज जो गायब हुई, वह है कवि की मूंछ! और एक भी कवि ने इस बाबत अब तक एक लाइन नहीं लिखी। जब तक मूंछ रही, तब तक कविता की पूछ रही। मूंछ गई। पूछ गई। हिंदी साहित्य की मूंछ परंपरा पर एक नजर डालिए। एक से एक बढ़िया मूंछें नजर आएंगी। किसी की पहलवान छाप, तो किसी की तराशी हुई तलवार छाप, किसी की दो मक्खी छाप हिटलर वाली, तो किसी की बारीक लाइन छाप, किसी की गलमुच्छड़ छाप, किसी की ऊपर के होंठ के आजू-बाजू विनय पूर्वक चिर प्रार्थी मुद्रा में लटकी हुई बीटल्स वाली, किसी की गोंद लगाकर तुर्रा देकर चढ़ी हुई, किसी की शरलॉक होम्स वाली और किसी की जादूगर मेनड्रेक वाली,आदि-इत्यादि।

कोई जमाना था कि साहित्यकार मूंछों से पूछा जाता था। जैसी मूंछ, वैसी पूछ। उन्हीं से रौब-रुतबा होता। उन्हीं से ताकत होती। शायद इसीलिए तब शोधकार्यों में साहित्यकार का ‘व्यक्तित्व’ पहले पूछा जाता, ‘कृतित्व’ का नंबर बाद में आता। आधुनिक कविता का इतिहास देख लीजिए। निराला के पास दाढ़ी-मूंछें, दोनों ही हैं, लेकिन प्रसाद और पंत सफाचट हैं। पंत तो इतने सफाचट रहे कि लोग उनकी कविता को ‘स्त्रैण स्वभाव’ तक की कहने से बाज न आए। हिंदी के जिस आखिरी कवि के पास मुकम्मल मूंछें पाई गईं, वे धूमिल रहे। एकदम पहलवान छाप मूंछें रखते थे और पहलवान की तरह ही उनकी गरदन कसी रहती थी।

शायद इसीलिए उनकी कविता में मर्दानगी का टच कुछ ज्यादा रहा। हिंदी साहित्य के इतिहास की शुरुआत ही चंद बरदाई की मूंछों से होती है। मूंछों के आधार पर युग-विभाजन संभव है। पाठकों की सुविधा के लिए, मूंछों को मानक मानकर नई कविता के इतिहास को दो भागों में बांटा जा सकता है-
एक है, धूमिल-पूर्व का मूंछोंवाला काव्य। दूसरा है धूमिलोत्तर, मूंछोत्तर, मॉडर्न सफाचट एकदम ‘क्लीन शेव्ड काव्य!’ धूमिल के बाद से ‘भाभूअ’ हुए कवियों को गिनकर देखिए। एक-एक कवि का फोटो देखिए। एक-दो अपवाद छोड़ दें, तो सब एकदम साफ-सपाट चेहरे वाले आदमी की तरह मिलेंगे। हां, इतिहास की एक बड़ी गलती पंकज सिंह के रूप में बची रह गई है। वह अभी तक किसी तरह अपनी मूंछें बचाए हुए हैं। उनकी मूंछों पर किसी हद तक जादूगर मेनड्रेक की मूंछों का प्रभाव नजर आता है। विमल कुमार भी कुछ इसी परंपरा में हैं। दबा-ढका एकाध अपवाद कोई और हो तो हो, वरना मूंछों की जैसी ‘केजुअल्टी’ अपनी मॉडर्निटी में हुई है, वैसी किसी और चीज की नहीं हुई।  जिसे नामवर ने ‘सपाटबयानी’ की कविता बताया, उसका सही-सही नाम ‘क्लीन शेव्ड कविता’ होना चाहिए था।

इस ‘क्लीन शेव्ड’ का असर आलोचना तक पर दिखता है। ढेर सारे आलोचक हैं। सैकड़ों रिव्यूअर हैं। लेकिन सब के सब साफ-सफाचट। एक भी आलोचक ऐसा नहीं, जिसके पास अपनी मूंछें हों। अपनी आलोचना मूंछ विहीन है। इसीलिए हिंदी कविता और आलोचना, दोनों सपाट चेहरे वाली हैं। हमारे मत में समकालीन हिंदी कविता पर हिंदी फिल्मों का बहुत गहरा प्रभाव पड़ा है। देवांनद, राज कपूर और दिलीप कुमार का असर तो गारंटी से पड़ा ही है। तीनों हीरो क्लीन शेव्ड, तो हिंदी के नए कवि अज्ञेय का अपवाद छोड़ सबके सब क्लीन शेव्ड। तार सप्तक  के अज्ञेय को छोड़ दें, तो बाकी छह कवि एकदम क्लीन शेव्ड हैं। मॉडर्निटी (में) मूंछें गईं, माया मिली न राम!

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