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अब भी बीमार है उत्तर प्रदेश

अस्सी के दशक के अंत में जनसंख्याविद आशीष बोस ने एक नया शब्द गढ़ा था ‘बीमारू।’ यह शब्द उन राज्यों के नामों के शुरुआती अक्षर को लेकर बना था, जहां एक ओर प्रति व्यक्ति आय और साक्षरता दरें बहुत नीचे थीं, दूसरी ओर शिशु मृत्यु-दर और कुपोषण बहुत ज्यादा था। बीआई का मतलब बिहार, एमए यानी मध्य प्रदेश, आर से राजस्थान और यू से उत्तर प्रदेश। यह शब्द ‘बीमार’ से मिलता-जुलता था और ये राज्य भी आर्थिक व सामाजिक दृष्टि से बीमार ही थे। इन चारों राज्यों में उत्तर प्रदेश को ज्यादा अच्छी तरह से जानता हूं। मैं देहरादून में पैदा हुआ और बढ़ा-पला। तब वह उत्तराखंड की राजधानी नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश का एक जिला भर था। हालांकि मैं तमिल हूं, पर संस्कृति और आचार से कुछ हद तक उत्तर प्रदेश का भैया हूं। मेरे नाना सन 1930 में उत्तर प्रदेश जाकर बस गए थे और मेरे पिता 1948 में। मेरी मां और मामा हिंदी माध्यम के स्कूलों में पढ़े हैं। हमारे घनिष्ठ मित्र इलाहाबाद के लोग थे। अपने बचपन और युवावस्था में मुझे कभी नहीं लगा कि मेरा राज्य पिछड़ा हुआ है। इलाहाबाद विश्वविद्यालय हालांकि तब पूरब का ऑक्सफोर्ड नहीं था, फिर भी उसकी अच्छी-खासी प्रतिष्ठा थी। मेरे वैज्ञानिक पिता जिस आगरा विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्रों का मार्गदर्शन करते थे, उसकी ठीकठाक इज्जत थी। कानपुर फलता-फूलता औद्योगिक शहर था, जहां शायद इसी वजह से सर्वश्रेष्ठ आईआईटी था।

प्रेमचंद की मृत्यु हो चुकी थी, लेकिन उनकी कहानियां पढ़ी जाती थीं और फिराक गोरखपुरी अपनी कविताएं सुनाने के लिए जीवित थे। लखनऊ और बनारस शास्त्रीय संगीत के सक्रिय केंद्र थे। जिस उत्तर प्रदेश में मैं बड़ा हुआ, वह सांस्कृतिक रूप से समृद्ध था और राजनीतिक रूप से प्रभावशाली। जब मैं 19 की उम्र में पहुंचा और मेरा देश 30 की उम्र में, तब पहली बार उत्तर प्रदेश के बाहर का कोई व्यक्ति भारत का प्रधानमंत्री बना। मोरारजी देसाई दो साल इस पद पर रहे और अगले 14 साल भारत के पांचों प्रधानमंत्री उत्तर प्रदेश के थे। जब देश का सबसे शक्तिशाली व्यक्ति अपने राज्य का हो, तो कोई कैसे सोच सकता है कि वह राज्य बीमार है? यह बताना जरूरी है कि उत्तर प्रदेश के बारे में मेरा आत्मविश्वास कुछ हद तक मेरी वर्गीय स्थिति की वजह से था। अगर मैं छोटा किसान या मजदूर होता, तो शायद अपने सूबे के बारे में कुछ अलग ढंग से सोचता। जब तक मैं वयस्क हुआ, तब तक सबके सामने यह साफ हो गया कि उत्तर प्रदेश मुश्किल में है। वहां के विश्वविद्यालयों का बुरी तरह पतन हुआ।

सांप्रदायिक और जातिवादी हिंसा आम हो गई। कानपुर और आगरा उद्योग के केंद्र नहीं रहे और प्रधानमंत्री दूसरे राज्यों से बनने लगे। उत्तर प्रदेश के आत्मविश्वास को आखिरी धक्का सांख्यिकी ने दिया। आजादी  के बाद के शुरुआती दशकों में आंकड़े राष्ट्रीय स्तर पर ही बनाए जाते थे, जैसे भारत का सकल घरेलू उत्पाद, भारत की विकास दर, एक भारतीय की औसत आय वगैरह। सन 1980 के बाद से आर्थिक विकास के विश्लेषक राज्यों में मौजूद फर्क को ज्यादा बारीकी से जांचने लगे। इसकी वजह यह थी कि देश की राजनीति भी संघीय हो गई थी, कांग्रेस का राज्यों या केंद्र में एकाधिकार नहीं बचा था। विकास से जुड़े अध्ययन अर्थशास्त्री ही नहीं कर रहे थे, राजनीतिशास्त्री, जनसंख्याविद और समाजशास्त्री भी इसमें शामिल हो गए थे। इन अकादमिक क्षितिजों के खुलने से राजनीतिक सत्ता, नेतृत्व की गुणवत्ता, स्कूलों और अस्पतालों की मौजूदगी वगैरह के बारे में नए तथ्य सामने आने लगे थे।

जब भारत के विकास के तथ्यों का बारीकी से विश्लेषण होने लगा, तो उत्तर प्रदेश की प्रतिष्ठा तेजी से कम होने लगी। पहले उत्तर प्रदेश के बुद्धिजीवी तमिलनाडु और केरल जैसे राज्यों को सांस्कृतिक रूप से अलग-थलग और राजनीतिक रूप से हाशिये पर मानते थे। आंकड़ों ने बताया कि आलोचना दूसरे कोने से होनी चाहिए। ज्यादा बुरा यह हुआ कि देश का सबसे बड़ा और राजनीतिक रूप से सबसे प्रतिष्ठित राज्य अब पिछड़े बिहार, सामंती मध्य प्रदेश और राजस्थान के साथ गिना जाने लगा। बाद में एक और राज्य इस सूची में शामिल हो गया, जो ओडीशा था। आंकड़ों के मुताबिक, यह भी उतना ही गरीब, अशिक्षित और सुविधाओं से विपन्न राज्य था। अब आशीष बोस के शब्द में एक अक्षर और जुड़ गया और वह बीमारू हो गया। इस शब्द के बनने के 30 साल बाद भी ये सारे राज्य तमिलनाडु, केरल, गुजरात, हिमाचल और महाराष्ट्र के मुकाबले गरीब हैं। लेकिन पिछले लगभग एक दशक में इनमें से चार राज्यों ने आगे बढ़ने की ठानी है।

इकोनॉमिक ऐंड पॉलिटिकल वीकली में छपे उत्सव कुमार और अरविंद सुब्रमण्यम के लेख के मुताबिक, 1993-2009 के बीच बिहार, मध्य प्रदेश, राजस्थान और ओडीशा की वार्षिक विकास दर उत्तर प्रदेश से ज्यादा रही। जहां तक स्वास्थ्य के मानकों का सवाल है, तो यह अन्य राज्यों से ज्यादा बीमार है। मिसाल के तौर पर, सन 2011 में उत्तर प्रदेश के सिर्फ 23 प्रतिशत बच्चों का टीकाकरण हुआ था, जबकि राजस्थान में यह आंकड़ा 26.5 प्रतिशत, बिहार में 32.8 प्रतिशत, मध्य प्रदेश में 40.3 प्रतिशत और ओडीशा में 51.8 प्रतिशत रहा। उत्तर प्रदेश के कमजोर प्रदर्शन की एक वजह इसका विशाल आकार है, जो प्रशासन के लिए चुनौती है। मुझे खुशी है कि अब देहरादून उत्तराखंड का हिस्सा है। लेकिन यह प्रक्रिया यहीं रुक नहीं जानी थी, बल्कि उत्तर प्रदेश के मैदानी इलाके को भी तीन या चार हिस्सों में बांटना चाहिए था। दूसरा और शायद ज्यादा महत्वपूर्ण कारण यह है कि उत्तर प्रदेश की राजनीतिक संस्कृति अत्यंत प्रतिक्रियावादी है।

पड़ोसी राज्य बिहार में राजनीति की भाषा सन 2005 के बाद बहुत बदल गई है। जहां पहले भाई-भतीजावाद और पक्षपात से ही चीजें चलती थीं, वहां अब सरकार की प्राथमिकताएं सड़कें व पुल बनाना, कानून व्यवस्था को सुधारना और ज्यादा से ज्यादा बच्चों को स्कूल तक लाना है। मध्य प्रदेश और राजस्थान में कांग्रेस-भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने प्रशासन और विकास पर ध्यान दिया। नीतीश कुमार, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे, अशोक गहलोत आदर्श राजनेता नहीं हैं। इन सबकी व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं हैं। अब भी वहां उम्मीदवार चुनने में जाति के गणित को ध्यान में रखा जाता है, फिर भी जो भाषा वे बोलते हैं, वह उम्मीद की भाषा है। बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान अब भी गरीब राज्यों में हैं, लेकिन राजनीति का बयान वहां बदल चुका है। दूसरी ओर, उत्तर प्रदेश की राजनीति अब भी भय में सिमटी हुई है।

भाजपा ऊंची जातियों की असुरक्षा को भड़काती है, सपा मुस्लिम और यादवों और बसपा दलितों की असुरक्षा की राजनीति करती है। मंदिर बनाना, मस्जिद बचाना, स्मारक खड़े करना यही काम पार्टियों और सरकारों के पास बचे हैं। उत्तर प्रदेश के राजनीतिक नेतृत्व का स्तर नीचे है। मुलायम सिंह और नीतीश कुमार, पुराने समाजवादी हैं, रीता बहुगुणा व अशोक गहलोत कांग्रेस के सदस्य हैं, राजनाथ सिंह और शिवराज सिंह चौहान भाजपा के लोग हैं। इन तमाम जोड़ियों में उत्तर प्रदेश के नेता प्रशासनिक क्षमता और सामाजिक नजरिये के लिहाज से बहुत कमतर हैं। इसलिए बिहार, मध्य प्रदेश और राजस्थान ने अपना-अपना इलाज करने की कोशिश की, पर उत्तर प्रदेश अब भी बीमारी की हालत में पड़ा है।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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