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इक चतुर नार करके सिंगार

भइयाजी अजगर की तरह विशाल थे, अत: विषधर होना उनके स्वभाव में था। किसे नहीं पता कि भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे महापुरुष बचाओ- बचाओ कहकर नहीं चिल्लाते। वे उसी कीचड़ में क्रीड़ा करते रहते हैं, जिसमें डूबे हुए होते हैं? बहरहाल, वह पत्रकारों के सिवा अपने किसी आलोचक को मुंह नहीं लगाते थे। उन्हें पता था कि अखबार की तकदीर में शाम तक बासी और बाद में रद्दी होना लिखा है। मुझे वह प्रतिभावान कवि, लेखक और पत्रकार मानते थे, अत: रोजाना शाम को अपने रस-रंजन में मुझे बुला लेते। मेरे मुख से निकली अपनी प्रशंसा को वह नीरज की कविता की तरह सुनते। मैं उनके विरोधियों को गरियाने लगता। वह हंसते-खिलखिलाते मेरी प्रतिभा को दुर्योधन की तरह अपनी गोद में बिठा लेते। मेरा चरित्र पांडवों के मुख की तरह लटक जाता।

भइयाजी नित्य-कर्म की तरह कृपा करते रहते। उन्होंने मुझे राज्य लेखक अकादमी का उपाध्यक्ष बनवा दिया और मेरी आठ पुस्तकें प्रकाशित करवा दीं। मेरे जिन मित्रों की प्रतिभा भइयाजी के आगोश में नहीं थी, वे मुझसे जलते-कुढ़ते। वे मुझे आईएएस या पीसीएस अधिकारी समझते, जो फाइलों को छोड़कर इफरात में कहानी, कविता, उपन्यास लिखने में व्यस्त रहते हैं। ऐसे ही एक अधिकारी का एक उपन्यास राजकीय मुद्रणालय ने छापा है, उसका शीर्षक है- बजट। पूरा बजट पढ़ लेने के बाद कहते हैं कि अमृतधारा का सेवन अनिवार्य हो जाता है। भइयाजी की ताकत भले ही अब एनडी तिवारी की तरह हो गई हो, पर उनकी इच्छाएं अब भी कैटरीना कैफ हैं। एक दिन उन्होंने मुझे बड़े प्यार से पुरस्करणीय मूर्ख कह दिया। मेरी प्रतिभा ने अंगड़ाई ली। मैंने पुरस्कार के लिए हाथ पसार दिया। उन्होंने बोतल पकड़ा दी। मुझ पर फागुन छा गया। सोचने लगा, हर लेखक अपने पापों के इतिहास का रामचंद्र शुक्ल है। लड़कपन का वीरगाथा काल जवानी में रीतिकाल और अधेड़ होते-होते भक्तिकाल हो ही जाता है। प्रतिभा का क्या? वह तो सदा की नगरवधू है। प्रतिभा जितना श्रृंगार करेगी, उतनी ही ज्यादा लार टपकवाएगी। ये मधुमास के दिन हैं। उसके बाद चुनावों के दिन।

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