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हालात चाहे जो भी हों

यह क्या हो गया? ऐसा तो उन्होंने सोचा ही नहीं था। हालात भी आदमी को कहां ले आते हैं? उनके अंदर कुछ टूटने लगा है। ‘जो हो रहा है, सो तो हो ही रहा है। फर्क उससे नहीं पड़ता। फर्क तो उससे पड़ता है कि आप उसे कैसे लेते हैं?’ यह मानना है डॉ. तारा ब्रैंच का। वह क्लीनिकल साइकोलॉजिस्ट हैं। विपस्सना की मशहूर टीचर तारा वाशिंगटन के इनसाइट मेडिटेशन कम्युनिटी की संस्थापक हैं। उनकी चर्चित किताबें हैं, रैडिकल एक्सेप्टैन्स  और ट्र रिफ्यूज। हम अपने हालात तय नहीं कर सकते। हम बेहतर हालात के लिए कोशिश कर सकते हैं। लेकिन यह भी तय है कि सब कुछ हमारे हाथ में नहीं होता। बहुत कुछ हमारे हाथ में होता है। लेकिन सब कुछ नहीं। सब कुछ तो किसी के भी हाथ में नहीं होता। कभी-कभी हमारी जिंदगी में ऐसा घट रहा होता है, जिसमें हमारा कोई वश नहीं होता। ऐसा नहीं है कि उससे हमारी जिंदगी पर असर नहीं पड़ता।

उससे जरूर हमारी जिंदगी पर असर पड़ता है। लेकिन वह असर कितना पड़ना है, उसे हमारा रवैया तय करता है। यह रवैया ही हमें उन हालात में खड़े होने या टूट जाने की ओर ले जाता है। यही वजह है कि कुछ लोग जरा-सी परेशानी आते ही टूट जाते हैं। और कुछ लोग बड़ी से बड़ी परेशानी भी आराम से निकाल देते हैं। हम अपनी जिंदगी के हालात तय नहीं कर सकते। लेकिन उन हालात के लिए अपना रवैया तो तय कर सकते हैं। हमारे हालात बदलते हैं, तो हमारा रवैया ही आगे की जिंदगी को तय करता है। हम अगर अपने रवैये में बदलाव नहीं करते, तो फिर दिक्कत में पड़ना तय है। वक्त के लिहाज से हमें उसे बदलना ही पड़ता है। हर हालात हमें एक अलग तरह की चुनौती देते हैं। उससे जूझना अलग तरह के रवैये की मांग करता है।

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