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रुकी हुई संसद

मौजूदा संसद का कार्यकाल खत्म होने को है। आखिरी सत्र चल रहा है। यह समूचा कार्यकाल ही इस बात के लिए जाना जाएगा कि इसमें लगभग रोज संसद का कामकाज बड़ी से बड़ी बात से लेकर छोटी से छोटी बात पर हंगामे की भेंट चढ़ गया। सरकार इसके लिए विपक्ष को दोषी ठहराती रही और विपक्ष इसके लिए सत्ता पक्ष को जिम्मेदार मानता रहा। हालांकि निष्पक्ष नजरिये से दोनों ही इसके लिए बराबर के जिम्मेदार हैं। इस सत्र में सरकार के एजेंडे पर 39 बिल हैं, इनमें से कितने पास हो पाएंगे, इसमें संदेह है। संसद के इस कार्यकाल के दौरान सिर्फ 165 बिल पास हुए हैं, जबकि संसद के हर कार्यकाल में 200 से कम विधेयक पारित नहीं होते। जो बिल पास हुए हैं, वे भी बिना किसी बहस के पास हुए हैं और अगर कुछ होंगे, तो वे भी इसी तरह होंगे। प्रमुख विपक्षी पार्टी भारतीय जनता पार्टी का तो यह कहना है कि क्योंकि इस सरकार का कार्यकाल खत्म होने को है, इसलिए उसे सिर्फ लेखानुदान मांगें ही पास करवाना चाहिए और बाकी कामकाज अगली सरकार के लिए छोड़ देना चाहिए।

फिलहाल भाजपा वालों को संसद का कामकाज बाधित करने की जरूरत नहीं है, क्योंकि तेलंगाना बिल का विरोध करने वाले आंध्र प्रदेश के सांसद लोकसभा और राज्यसभा, दोनों में ही कामकाज नहीं होने दे रहे हैं। सरकार अगले हफ्ते तेलंगाना को अलग राज्य बनाने का बिल पेश करेगी, यानी यह हंगामा रुकने वाला नहीं है। हमारे यहां संसद का कामकाज इस तरह चलता है कि अगर चार-पांच सांसद भी चाह लें, तो वे संसद का कामकाज रुकवा सकते हैं और आंध्र प्रदेश के विभाजन का विरोध करने वाले सांसदों की तादाद कहीं ज्यादा है। यह बात और है कि इन सांसदों के विरोध करने का तरीका गलत है। इस तरह वे तेलंगाना बिल को संसद में लाने से शायद रोक भी नहीं पाएंगे, क्योंकि सरकार इस बात पर दृढ़ है, लेकिन वे संसद का बाकी कामकाज तो रुकवा ही सकते हैं। उन्हें संसद के कामकाज की कोई फिक्र नहीं है, क्योंकि वे आंध्र प्रदेश में अपने वोटरों को संदेश देना चाहते हैं कि वे तेलंगाना के बनने का हर तरह से विरोध कर रहे हैं।

यह विरोध संभवत: इस पूरे सत्र के दौरान चलता रहेगा, इसलिए इस सत्र में कामकाज चलने की उम्मीद कम ही है। इसके अलावा अन्नाद्रमुक के सांसद भी तमिल मछुआरों के सवाल पर संसद के कामकाज में बाधा डाल रहे हैं। फिर कुछ दूसरे मुद्दे भी हैं, जिन पर शोर-शराबा हुआ है। अगर किसी तरह यह हंगामा रुका, तो भाजपा के सांसद ऑगस्टा वेस्टलैंड हेलीकॉप्टर सौदे के घोटाले को लेकर शोर मचाएंगे, इसके बाद भी विपक्ष कोई न कोई मुद्दा तलाश ही लेगा। संसद की बुनियादी अवधारणा यह है कि वहां हर मुद्दे पर बहस हो, लेकिन एक-दूसरे को अपने तर्क समझाएं और अंत में बहुमत से फैसला हो। शुरुआती दौर में यह हुआ भी, लेकिन साठ के दशक में सांसदों को यह समझ में आया कि शोर मचाकर और बाधा डालकर अल्पमत में होते हुए भी अपनी बात मनवाई जा सकती है या दूसरे की बात को दबाया जा सकता है। यह प्रवृत्ति सरकारी पक्ष और विपक्ष, दोनों को ही रास आई और धीरे-धीरे यही संसद की मुख्यधारा बन गई और बहस-मुबाहिसा गौण पक्ष हो गया। लेकिन ऐसा अनिश्चित काल तक नहीं चलने दिया जा सकता। कम से कम यह तो तय होना चाहिए कि सदन में कितने घंटे कामकाज होगा। संसद को चाहिए कि वह सांसदों को नियंत्रित करने के लिए ज्यादा सख्त नियम बनाए, क्योंकि अगर एकाध कार्यकाल इसी तरह और गुजर गया, तो संसद की गरिमा और विश्वसनीयता खतरे में पड़ सकती है।

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