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इनसे भी सीखिए

हर रोज एक व्यक्ति सुबह-सुबह आता है और रेहड़ी पर छोले-भटूरे की अपनी दुकान को सजाने लगता है। यह शख्स होटल मैनेजमेंट इंस्टीट्यूट, पूसा के सामने अपनी रेहड़ी लगाता है। देर शाम तक यह दुकान चलती रहती है। ग्राहक आते हैं और छोले-भटूरे का मजा लेते हैं, वह भी सिर्फ दस रुपये में। यह शख्स छोले-भूटरे के साथ अपने विनम्र व्यवहार का जायका भी उन्हें परोसता है। दोनों हाथ चलते रहते हैं और आपने मांगा नहीं कि उसने दे दिया। पांच सितारा होटलों के भावी प्रबंधक लंच-ब्रेक में यहां आते हैं और छोले-भटूरे के साथ प्याज, चटनी और आचार का लुत्फ उठाते हैं। जब विज्ञापन ही सबसे महत्वपूर्ण हो, तब कोई व्यक्ति अपनी मेहनत और व्यवहार से अपना धंधा कैसे चमका सकता है, यह इनसे सीखने की जरूरत है। इससे यह भी पता चलता है कि अगर आप कार्य-कुशल हैं, तो बड़ी दुकानें आपको लील नहीं सकतीं।
जेके वर्मा, दिल्ली
jkverma65@gmail.com

हमें माफ करना नीडो

गांव-देहात में जब कोई नवब्याहता आती है, तो स्त्रियों द्वारा उसका चेहरा देखने यानी ‘मुंह दिखाई’ की परंपरा रही है। नव-ब्याहता कैसी भी हो, उसमें मीन-मेख निकाल ही लिया जाता था। उपमाओं की ऐसी विसंगतियां गढ़ी जाती थीं कि वीभत्स रस की बाढ़ आ जाती। लेकिन यह तब की बात थी, जब निरक्षरता ने हमारे बौद्धिक पट बंद कर रखे थे। प्रश्न यह है कि आज पढ़े-लिखे होने के बावजूद लोगों की बौद्धिकता और व्यक्तित्व संकुचित क्यों है? क्यों लोग किसी पर नस्लभेदी-रंगभेदी टिप्पणियां कर स्वयं को उससे श्रेष्ठ साबित करना चाहते हैं? देश की राजधानी में पूर्वोत्तर के नीडो तानियाम के साथ जो हुआ, उसे मानवीय कतई नहीं कहा जा सकता। नस्लीय हिंसा ने नीडो के प्राण छीन लिए। यह पूरी घटना सिर्फ इतनी नहीं है, बल्कि सभ्यता के सफर में हम कितने मानव बने हैं, यह भी इसी घटना का एक हिस्सा है। यदि हम सभ्य मानव हैं, तो हम सब बराबर हैं। फिर बराबरी के स्तर से स्वयं को उठाकर श्रेष्ठ या दूसरे को गिराकर तुच्छ साबित करने की यह जंग क्यों? श्रेष्ठता की सोच वर्गीकरण चाहती है और वर्गीकरण ही भेदभाव का आधार है। किसी की शारीरिक बनावट, रंग-रूप, नैन-नक्श या उसकी व्यक्तिगत पसंद और पहनावों पर किसी अन्य की रुचि या अरुचि का औचित्य ही क्या है? माफ करना नीडो! अभी हम मानव कहलाने लायक नहीं हुए हैं।
सुशील पाण्डेय, दिल्ली
sushil.ppandey@gmail.com

इम्तिहान का इंतजार

कहते हैं कि सब्र का फल मीठा होता है। लेकिन फल मिलने तक दांत ही न रहे, तो उसका क्या महत्व? यही हाल दिल्ली के उन युवाओं का है, जो बरसों से यह इंतजार कर रहे हैं कि दिल्ली सब-ऑर्डिनेट सर्विसेस सलेक्शन बोर्ड उनकी परीक्षा लेगी और उन्हें नौकरी देगी। पर यह संस्थान कितना सुस्त है, इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि साल 2009 में भरे गए आवेदन-पत्रों की परीक्षा-प्रक्रिया आज की तारीख तक पूरी नहीं हो पाई है। परीक्षा का न होना, प्रश्न-पत्र का लीक हो जाना या परीक्षा रद्द हो जाना या वर्षों तक परिणाम का इंतजार करना, यह सब युवाओं के मनोबल को घटाना ही है। जरा सोचिए, इससे युवा-शक्ति का कितना ह्रास हो रहा है? यह स्थिति कब बदलेगी?
अर्चना भारती, पुरानी दिल्ली
archanabharti85@gmail.com

तीसरे मोर्चे की राजनीति

तीसरे मोर्चे की असली सूरत क्या होगी, यह आम चुनाव के परिणामों के बाद ही पता चलेगी। लेकिन फिलहाल ग्यारह पार्टियां एक साथ हैं और अपने-अपने क्षेत्रों में जनाधार को खिसकने से रोक रही हैं। इन लोगों ने एक संभावना तो बनाई है कि अगर कांग्रेस की हालत बिगड़ती है और भाजपा बहुमत से पीछे रह जाती है, तो तीसरा मोर्चा किंगमेकर या किंग की भूमिका में आ सकता है। हालांकि इस मोर्चे का हश्र क्या होगा, यह पहले भी देखा जा चुका है।
सुदेश कुमार, पटपड़गंज, दिल्ली

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