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येदियुरप्पा के बावजूद राह कठिन

येदियुरप्पा के बावजूद राह कठिन

कर्नाटक दक्षिण का एकमात्र राज्य है जहां भाजपा सबसे मजबूत दिखती है। पार्टी को उम्मीद है कि केंद्र की सत्ता हासिल करने में यहां की 28 सीटों से उसे अहम सहयोग मिलेगा। भाजपा पिछले दो लोकसभा चुनावों में यहां नंबर एक रही है। हालांकि, इस बार फिजा बदली हुई है। भले ही देश भर में कांग्रेस के खिलाफ माहौल की बात की जा रही है, पर चुनाव पर्यवेक्षक मान रहे हैं कि कनार्टक इस माहौल से अछूता रहेगा।

यहां पर पिछली बार के मुकाबले भाजपा को नुकसान होगा और उसका फायदा हाल में राज्य की सत्ता पर काबिज हुई कांग्रेस को होगा। ऐसा नहीं है कि भाजपा इस खतरे को नहीं जानती। उसने संभावित नुकसान को रोकने के मकसद से भ्रष्टाचार के आरोपों में पार्टी से निष्काषित वी एस येदियुरप्पा की वापसी को मंजूरी दी है।

लिंगायत समुदाय पर पकड़ रखने वाले येदियुरप्पा राज्य के मुख्यमंत्री रह चुके हैं। भाजपा को भरोसा है कि येदियुरप्पा के आने से उसको लिंगायत समुदाय का समर्थन मिलेगा। राज्य में लिंगायत समुदाय की आबादी18 फीसदी है जो चुनाव नतीजों को प्रभावित करती रही है। लेकिन भाजपा यह नहीं बता पाई है कि वह कर्नाटक में येदियुरप्पा को लेकर भ्रष्टाचार की समस्या से कैसे लड़ेगी।

भाजपा
ताकत:
  कांग्रेस के मौजूदा मुख्यमंत्री सिद्धारमैया को उच्च जाति विरोधी माना जाता है। ऐसे में येदियुरप्पा की वापसी से लिंगायत समुदाय समेत उच्च जातियों का वोट भाजपा के पक्ष में आ सकता है।

कमजोरी: येदियुरप्पा की वापसी से पार्टी में आपसी गुटबाजी तेज होने की आशंका है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अनंत कुमार येदियुरप्पा के धुर विरोधी माने जाते हैं और उन्होंने उनकी वापसी का विरोध भी किया था

कांग्रेस
ताकत:
  येदियुरप्पा पर लगे भ्रष्टाचार के मामलों के बहाने भाजपा के दोहरे मापदंड का प्रचार कर सकती है। हाल में शुरू की गई सस्ते दर पर चावल देने की योजना का भी फायदा होगा।

कमजोरी:  मुख्यमंत्री सिद्धारमैया खुद एक परेशानी बन सकते हैं। पार्टी कार्यकर्ताओं का आरोप है कि राज्य सरकार उनके लिए कुछ नहीं कर रही है।

जेडीएस
ताकत:
राज्य के कुल मतदाताओं में 12 फीसदी आबादी वोक्कालिंगा की है। इनमें अधिकतर गौड़ा के समर्थक हैं। कांग्रेस और भाजपा विरोधी मत भी पार्टी के पक्ष में जा सकते हैं।
कमजोरी: पार्टी के सभी फैसले पूर्व प्रधानमंत्री एडी देवेगौड़ा और उनके बेटे एचडी कुमार स्वामी लेते हैं। ऐसे में पार्टी की रणनीति को अमल करने में समय लगता है। पिछले साल दिए एक साक्षात्कार में खुद कुमार स्वामी ने यह बात मानी थी।

 

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